माँ तू कैसी है स्वर्ग में ?

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                                                                         नेह अर्जुन इंदवार

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माँ तू कैसी है ?

आशा करती हूँ

तू स्वर्ग में सुखी होगी,

मेरी चिट्ठी तुम्हें मिलती तो है न माँ !

 

 तुम्हारी दुलार की बहुत चाहत होती है माँ,

         छाती में लटक कर खूब रोने को दिल करता है,

मैं यहाँ अकेली हूँ,  तू भी वहाँ अकेली होगी,

हम साथ में क्यों नहीं रह सके माँ ?

आखिर तुम मुझे अकेले छोड़ क्यों चली गई स्वर्ग ?

क्या स्वर्ग हमारे गाँव से भी सुंदर है ?

 

गाँव की टेडी-मेढी पगडंडी,

महुआ-कुसुम और सखुआ के झूंड,

चरईओं के चेरे-बेरे, बकरियों के पीछे छौर में चलते गाय-बैल,

भैंस पर चढे. बिरसा और मंगरा की शरारत,

शनियारो, भिखनी और साँझो की

पगडंडियों पर गुँजती जतरा के गीत,

बहिंगा लहसुआ होने तक धान के बाली,

आंगन में चेंगना साथ दाना चुगती मुर्गी,

आखरा में मांदर बजाते सोमरा,

और लहरा के नाचती दीदी और नानी बुढ़िया,

क्या स्वर्ग में भी बंसुरी बजते हैं माँ ?

 

माँ, मैं खूब मन लगा कर पढ़ती हूँ,

तुमने कहा था न  “मेरी तरह न रहना बेटी अनपढ़”, 

क, ख, ग वर्णमाला मैंने जल्द ही खत्म कर ली थी,

हर साल नयी कक्षा आती है माँ,

नयी किताबें, नये अध्याय, नयी बातें,

कुछ आती है समझ में, कुछ निकल जाते सर से उपर,

समाज, परिवार, दुलार, “नेह” जल्दी सीख गई मैं,

जानवर और इंसान के पाठ भी याद कर लिया मैंने,

इंसान तो समझ में आता है माँ,

मुश्किल क्यों होता है इंसानियत के पाठ में। 

 

अपना, पराया, अपनापन और दूसरापन,

प्यार से मुस्काती निगाहें,

पीठ पीछे चलती टेढ़ी नजरें,

सीधे शब्दों में उलटे अर्थ,

व्यंग्य वाण के कहावतें,

कहते सब, हतभागी लड़की तू,

क्यों, कब मैं हतभागी बन गयी माँ,

बहुत मुश्किल होती है माँ बातें समझना।

सुनते हैं स्वर्ग जैसा सुंदर शहर भी होते हैं। 

 

भाषा संस्कृति और चाल-चलन

सब होता है अलग बोली भी शहर में।

झालो, गोरेती, और सालो

और भी कई मेरी सहेली गई थी शहरों में।

बहुत बदल गई हैं माँ वे, नये कपड़ों में,

तेल, क्रीम, मेकअप और मोबाईल,

मुझे दिखाती है और  कहती हँसती हैं”, 

तेरी किस्मत में नहीं ये सब चीजें,” 

क्या स्वर्ग भी शहर जैसी है माँ ?

 

फैशन से कैसे बदल जाते हैं आदमी माँ,

क्या मेकअप बदल देता है उन्हें दिल से,

जवान होकर चले जाते शहरों में वे,

और लौट नहीं आते फिर कभी गाँव,

क्या सचमुच गाँव इतनी बूरी है ? 

क्या स्वर्ग से भी सुंदर शहर है माँ ?

 

माँ, मैं जल्दी बड़ी होना चाहती हूँ

 स्वर्ग-शहर सब देखना चाहती हूँ,

तुम क्यों मुझे छोड़ चली गई माँ जल्दी,

तुम्हारी क्या-क्या मजबूरी रही होंगी माँ,

सब कुछ जानना, सोचना चाहती हूँ,

जिंदगी क्या स्वर्ग और शहर सा सुंदर हैं ?