पत्थलगड़ी की उलझन

third ad

                                                                              वाल्टर कांदुलना 

third ad

                        भाग एक

पत्थलगड़ी आदिवासियों का, विशेषकर मुंडा प्रजातियों की एक प्राचीनतम मेगालिथिक (पाषाण) परंपरा है. Megalithik ग्रीक भाषा के दो शब्दों अर्थात् Mega=महा,और Lithik=पाषाण से बना है; यानी बड़ा पत्थर.

किसी भी समाज में पत्थलगड़ी का मुख्य उद्देश्य किसी घटना को ना केवल स्मारक या यादगारी के रूप में संजोकर रखना है बल्कि वह उनकी अपनी जीवन शैली का भी परिचायक है. जैसे “ससन दिरी” अगर किसी #अपने_पूर्वज_की_याद_में_पत्थल_को_गाड़ा_जाता_है तो साथ ही उसकी आत्मा को अपने घर में स्थान और सम्मान देने का भी एक प्रतीक है.

पत्थलगड़ी आदिवासियों के अस्तित्व और उनकी आस्था की पहचान ही नहीं बल्कि उनका जीवन्त प्रमाण भी है. पत्थलगड़ी के द्वारा आम आदिवासी आपस में अपने परिवार से या अपने गाँव से या अपने समाज से एक भावनात्मक रिश्ते में बंधे हुए होते है. यही बंधन उनके भौतिक अस्तित्व को बनाये रखने में बेहद मददगार होती है और सामाजिक रूप से जिन्दा बनाये रखता है.

मुंडाओं में कम से कम #चालीस_प्रकार_के_पत्थलगड़ी होते हैं. ये मुंडा प्रजाति के इतिहास पथ है. और उनकी पहचान और अस्तित्व, सभ्यता और संस्कृति के गौरवशाली प्रमाण और विरासत है.
अभी भी यह परंपरा जीवित है.
पत्थलगड़ी के इसी क्रम में
“#सीमान_दिरी” एक तरह का #पत्थलगड़ी_है_जो_गांव_की_सीमा_को_दर्शाता_है.

#अखड़ा_दिरी_अखड़ा_में_गाड़ा_जाता_है, जिसका उद्देश्य शिक्षा देने के लिए होता है.
आज #पत्थलगड़ी एक सरकारी विवाद के घेरे में है. सरकार पत्थलगड़ी को अपने पूंजीपति मित्रों की राह में रोड़ा मान रही है और इसलिए इसको गैर-संवैधानिक घोषित करने में तुली हुई है.

आदिवासी क्षेत्रों में शिलापट्टों के द्वारा कानून सम्बन्धी जानकारी देंना कोई नई बात नहीं है.

बीस वर्ष गुजर गए. फरवरी,1997 में डॉ बी.डी शर्मा ने झारखण्ड के सैकड़ों गावों में दौरा करके The Provisions of the Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act-1996 संक्षेप में पी-पेसा कानून-1996 के द्वारा संवैधानिक प्रदत्त ग्राम सभा की सात शक्तियों को शिलापट्टों पर लिख कर उन्हें गडवाया थाI और पारंपरिक ग्राम-सभा को स्थापित करने की कोशिश की थीI उस समय डॉ शर्मा ने एक नारा भी दिया था :“ना लोक सभा ना विधान सभा, सबसे बड़ा ग्राम सभा”I लेकिन तब से अब तक सरकार ने अभी तक इस कानून पर कोई संज्ञान नहीं लिया तथा 20 वर्षों के गुजर जाने के बावजूद अब तक किसी भी सरकार ने इस कानून को लागू करने की कोई जहमत नहीं उठाई I
पर अब यह पत्थलगड़ी सरकार की आँखों में गड़ने लगी है. पत्थल-गड़ी की इसके आशय से सरकार को अपने और पूंजीपतियों के हित साधने में बाधा पहुँच रही है I
मूल सवाल यह है सरकार /सरकारों ने पी-पेसा कानून-1996 को अभी तक क्यों लागू नहीं किया है? कानून का पालन करने की जिम्मेदारी क्या सिर्फ नागरिकों/जनता को ही है सरकार को नहीं?

अब तक सरकार ने आदिवासियों से जो छल किया है क्या वह उसकी भरपाई कर सकती है.?
सर्वप्रथम तो सरकार ने The Provisions of the Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act-1996 से *Provisions* को गायब कर दिया और उक्त कानून के नाम को The Panchayats (Extension to the Scheduled Areas) Act-1996 के नाम से प्रचारित कियाI और इसी गलत नाम के आलोक में झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम-2001 को , जो सामान्य क्षेत्र का कानून है, अनुसूचित क्षेत्र में भी थोप दिया . जबकि संविधान के अनुच्छेद 243 (M) में यह स्पष्ट है कि भाग IX की पंचायत व्यवस्था अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं की जा सकती हैI उसी प्रकार संविधान के अनुच्छेद 243ZC के तहत अनुसूचित क्षेत्रों में नगर निगम और नगर-पंचायतें असंवैधानिक हैं क्योंकि राज्य विधायिका द्वारा निर्मित कानून झारखण्ड म्युनिसिपैलिटी अधिनियम 2011 अनुसूचित क्षेत्रों में लागू नहीं किया जा सकता हैIक्या सरकारें , कानून से ऊपर होती हैं?

अभी हाल में दिनांक 28/03/18 के प्रभात खबर प्रथम पृष्ठ पर यह छापा गया कि “ जमीन की हेराफेरी करने वाले अफसरों , कर्मियों पर नहीं होगा केस” यह मुद्दा और इसकी भाषा क्या किसी सभ्य समाज में मान्य हो सकती है? यह तो एक सीधा सा “जिसकी लाठी उसकी भैंस” का लट्ठमार ऐलान है. लेकिन मुख्यमंत्री महोदय पूरी बेशर्मी और निर्लज्जता से एक झटके में पूरी मानवता की समस्त सभ्यता के आधार को ही नकार देते हैं..

दूसरा सवाल अब यह होता है कि वास्तविक देशद्रोही कौन है? जिसने कानून की गलत व्याख्या करके उसके द्वारा आदिवासियों की लाखो एकड़ जमीन को हथियाया /अधिगृहीत किया, जमीन की हेराफेरी करने वाले अफसरों पर कोई कानूनी कारर्वाई नहीं की या जिसने पत्थल पर अपनी जमीन और अपने अस्तित्व को बचाने के लिए दो वाक्य लिखे ? वैसे भी जिसके लिए जमीन की हेराफेरी करना गलत नहीं है ,उसके लिए कानून की व्याख्या करना या अ-व्याख्या करने क्या कोई मतलब हो सकता है ?
सच पूछा जाए तो पत्थलगड़ी एक संवेदनहीन और बहरी सरकार के सामने अपने अस्तित्व को बचाने का एक आह्वान मात्र है.

पत्थलगड़ी …..(भाग –दो)

सरकार का #पत्थलगड़ी पर मूल आरोप यह है कि संविधान के अनुच्छेद 13(3) a ,19(5) 19(6), और 244 (1) को गलत ढंग से पेश किया गया है.
आइये इन पर हम एक-एक करके विचार करें.

1) अनुच्छेद 13(3) a का मूल भाव यह है .Law includes any ordinance ,order , bye-law, rule, regulations notifications , <Customs or Uses> having in the territory of India has the <Force of law> .#दूसरे_शब्दों_में_परंपरा_या_पारंपरिक_व्यवहार (#रुड़ीवादी_व्यवस्था) #को <#विधि_का_बल> #प्राप्त_है. झारखण्ड के  #आदिवासियों_ की_एक_सामजिक_राजनीतिक_व्यवस्था है जिसे एक common नाम दिया जा सकता है: “पड़हा व्यवस्था”.

पी-पेसा कानून 1996 का सेक्शन 4 (a) और 4(d) में #customary_law, social and religious practices and traditional management practices of community resources, traditions and customs ,cultural identity आदि के बारे में चर्चा है .
ये दोनों सेक्शन मूलतः अनुच्छेद 13(3) a के ही विस्तार (Extension) है. लम्बे 20 साल गुजर गए , अभी तक सरकार ने पी-पेसा कानून-1996 के इन सेक्शनों के संगत (in consonance) कोई विनियम नहीं बनाया है. आखिर क्यों ? गलती किसकी है? पत्थल पर लिखने वाले की या इसे गलत समझने वाली सरकार की? हमें सरकार यह बताये कि पी-पेसा कानून-1996 के सेक्शन 4 (a) और 4(d) का अनुपालन अभी तक क्यों नहीं किया गया है?
क्या कानून का पालन करने की जिम्मेदारी सिर्फ जनता पर होती है, सरकार पर नहीं ?
2) अनुच्छेद 19(5) और 19(6) Nothing in sub-clause (d) and (e) of the said clause shall affect the operation of any existing law in so far it imposes , or prevent the State from making any law imposing in the interest of public order or morality , <reasonable restrictions> on the exercise of the right conferred by the said sub clause.
Sub clause (d) और (e) आम नागरिकों के भारत में स्वतन्त्र रूप से विचरण करने, निवास करने तथा व्यापार करने का अधिकार देता है.
अब ध्यान देने योग्य बात यह है कि झारखण्ड मूलत आदिवासियों के हितों को ध्यान में रख कर बिहार से अलग किया गया था. लेकिन वर्तमान परिपेक्ष्य में आदिवासी हित की बात तो छोड़िये , विभिन्न उद्योगों और माइंस और भूमि बैंक , झारखण्ड मोमेंटम आदि के द्वारा उनके विस्थापन और विनाश की पटकथा क्या नहीं लिखी जा रही है?

वैसे भी अनुच्छेद 19(5) और 19(6) का विस्तारण उपर्युक्त कानून पी-पेसा 1996 के आलोक में सेक्शन 4(m) (iii) और 4(m) (iv) के द्वारा किये गए हैं. सरकार किसी मुद्दे के एक पक्ष को ही देखने का प्रयत्न कर रही है?
3) अनुच्छेद 244(1) : The provisions of the Fifth Schedule shall apply to the administration and control of the Scheduled Areas and Scheduled tribes in any State other than the State of Assam, Meghalaya, Tripura and Mizoram.

संविधान के अनुसार अनुसूचित क्षेत्रों का प्रशासन और नियंत्रण पांचवीं अनुसूची के तहत किया जाना है. इसके तहत #राज्य_सरकार_को_सिर्फ_कार्यपालिका_के_अधिकार_हैं.[*सेक्शन 2]

लेकिन सच्चाई तो यह है कि सरकार , अनुसूचित क्षेत्रों को एक <सामान्य क्षेत्र की तरह> मान कर इन पर अपना नियंत्रण रखने की कोशिश कर रही है. बल्कि यहाँ की कार्यपालिका ने राज्यपाल के अनुसूचित जनजातियों से सम्बंधित अधिकारों को हाईजैक कर लिया है. अनुसूचित जनजातियों की जमीन सम्बंधित मामलों में तथा जनजाति परामर्शदात्री परिषद् के मामले में राज्य की कार्यपालिका का अनधिकृत दखल-अंदाजी हो गया है , जो कि सिर्फ और सिर्फ राज्यपाल के अधिकार क्षेत्र में है.[सेक्शन4(2)]

अभी तक TAC की नियमावली नहीं बनी है इसके बावजूद आदिवासियों की जमीन की सुरक्षा से सम्बंधित कानून जैसे सीएनटी/एसपीटी कानून, जमीन अधिग्रहण कानून 2013 आदि का संशोधन TAC की आड़ से किया जा रहा है.#रघुवर_दास_Tribes_Advisory_Council_का_अध्यक्ष_नहीं_बन_सकता है? [सेक्शन 4(1)]
सरकार के अधिकार क्षेत्र में भूमि-बैंक बनाने की शक्ति नहीं है.[सेक्शन 5(2)a]
हाल में सरकार ने जमीन पर अवैध कब्ज़ा करके रहने वालों को उस जमीन का मालिकाना देकर कब्जे को वैध घोषित कर दिया है.
दूसरे शब्दों में #सरकार_हर_दिन_आदिवासियों_के_हित_के_कानूनों का बलात्कार कर रही है .परन्तु उसे सवाल करने वाला कोई नहीं है. राज्यपाल का पद एक रबर-स्टाम्प में तब्दील कर दिया गया है . जबकि वह अनुसूचित जनजातियों और अनुसूचित क्षेत्र का संरक्षक (custodian) होता है.

पी-पेसा कानून 1996 के तहत, अपवादों और उपान्तरों के अधीन , अनुसूचित क्षेत्र की ग्राम सभाओं को सात शक्तियां दी गयी हैं. [सेक्शन 4 m (i) से (vii) तक.] ,लेकिन सरकार ने इनकी जगह ग्रामीण क्षेत्र में झारखण्ड पंचायत राज अधिनियम 2001 और शहरी क्षेत्र में झारखण्ड म्युनिसिपैलिटी अधिनियम 2011 को लागू कर दिया है.
संविधान की धाराओं 243-M(1) और 243-ZC(1) के आलोक में उपर्युक्त ये दोनों अधिनियम बिल्कुल असंवैधानिक है.

निष्कर्ष: सरकार पत्थर पर लिखे गए व्याख्या को तो गलत कह रही है. और उसके द्वारा पत्थलगड़ी को ही असंवैधानिक सिद्ध करने की कोशिश में है. लेकिन अनुसूचित क्षेत्रों में गलत कानूनों को लागू कौन कर रहा है?. सरकार को पहले अपने गिरेबान में झांकना चाहिएI.

संभवतः झारखण्ड में खुद सरकार के ही द्वारा आदिवासी सम्बंधित संवैधानिक प्रावधानों का सबसे ज्यादा उल्लंघन हो रहा है.I इस प्रकार के संवैधानिक घोटाले सभी प्रकार के घोटालों से गंभीर और विस्तृत होता हैI
सरकार को पहले इस पर विचार करना चाहिए.I

सरकार आदिवासियों को और उनकी परम्पराओं को नष्ट करने का कुचक्र का चक्र चलाना छोड़ेI
पत्थलगड़ी संविधान के खिलाफ नहीं है.I

पत्थलगड़ी आदिवासियों की परंपरा है और इसे कानून का बल भी प्राप्त हैIयह आदिवासियों का मौलिक अधिकार हैI किसी को इसे छीनने का अधिकार नहीं है I सरकार को भी नहीं I