टी बोर्ड देगा युवाओं को रोजगारमूलक प्रशिक्षण

                                                                 नेह अर्जुन इंदवार

भारत सरकार की संस्था इलेक्ट्रोनिक्स आफ इंडिया, जलपाईगुड़ी जिले के बंदरहाट, मालबाजार और जलपाईगुड़ी शहरों में चाय बागान के कुल 75 बच्चों आदिवासी को 3 महीने का रोजगारमूलक प्रशिक्षण देगा। उपरोक्त तीन प्रशिक्षण केन्द्रों में 8 लाख रूपये करके प्रति केन्द्र खर्च होंगे। व्यय का भार टी बोर्ड उठाएगा। बेरोजगार आदिवासी युवाओं को कम्प्यूटर डाटा इंट्री अपरेटर, मोबाईल रिपेयरिंग, कम्प्यूटर हार्डवेयर आदि के क्षेत्रों में Skill Training दिया जाएगा।

बेरोजगारों को कौशल प्रशिक्षण देना उन्हें रोजगार के क्षेत्र में नौकरी देने का प्रथम चरण होता है। नौकरी के बाजार में सिर्फ कुशल हाथों की मांग होती है। अकुशल हाथों को कोई भी नौकरी देना नहीं चाहता है। डुवार्स तराई में माध्यमिक, उच्च माध्यमिक और ग्रेज्युएट सहित पोस्ट ग्रेज्युएट युवाओं की अच्छी खासी तदाद है। गरीबी में रह कर भी किसी तरह शिक्षा प्राप्त युवाओं के पास डिग्री आदि प्राप्त करने के बाद रोजगारमूलक व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए संसाधन नहीं होते हैं और वे अकुशल शिक्षित बेरोजगार होकर नौकरी की खोज में दिशाहीन होकर दर-दर भटकते हैं। व्यवसाय के क्षेत्र में भी वे उतरने का साहस नहीं करते हैं, क्योंकि उसके लिए भी उन्हें उचित सलाह और प्रशिक्षण कहीं नहीं मिलता है। गरीब युवाओं को बिना कौंसिलिंग के किसी भी क्षेत्र में जाने के लिए कोई सटीक मार्ग नहीं मिलता है और वे भटकते रहते हैं।

चाय बागानों में करीब 2 लाख से अधिक बेरोजगार युवा हैं और उनमें से इक्का दुक्का को प्रतिस्पर्धा के बाद ढंग की सरकारी-बेसरकारी नौकरी हाथ लगती है। अधिकतर युवाओं को निराशा ही हाथ लगती है और वे या तो मानसिक अवसाद का शिकार हो जाते हैं या अन्य ऐसे कार्य करने लग जाते हैं जहाँ उनका कोई निश्चित भविष्य नहीं होता है।

यहाँ ध्यान देने की बात है कि टी बोर्ड जलपाईगुड़ी जिले में अवस्थित प्राईवेट प्रशिक्षण संस्थानों में 8 लाख रूपये खर्च करके 25-25 युवाओं को प्रशिक्षण दिलाएगा। मतलब प्रत्येक युवा पर 32 हजार रूपये खर्च करेगा। इनमें प्रत्येक प्रशिक्षणार्थी को प्रति महीना 1500 अर्थात् तीन महीने में 4500 रूपये का वजीफा दिया जाऩा भी शामिल है।

कितना अच्छा होता यदि टी बोर्ड यही प्रशिक्षण वह खुद के प्रशिक्षण संस्थान में देता तो उसमें बमुश्किल 8 से 10 हजार रूपये खर्च आता।

चाय बागान औद्योगिक क्षेत्र होने के कारण यहाँ की कंपनियों पर CSR (Company Social Responsibility) को पूरा करने का भी उत्तरदायित्व है। कई कंपनियाँ सिलीगुड़ी और अन्य शहरों में CSR के पैसों को खर्च करती है। यदि टी बोर्ड इन कंपनियों के CSR के पैसों से अपना स्वयं का प्रशिक्षण संस्थान शुरू करे, तो यह प्रति वर्ष कई सौ युवाओं को मुफ्त में रोजगारमूलक प्रशिक्षण दिला सकता है। राज्य सरकार के श्रम दफ्तर भी इस संबंध में नया कदम उठा सकता है। डुवार्स तराई के चाय मजदूर संघ को भी आगे आकर इस विषय पर काम करना चाहिए। डेटा इंट्री, मोबाईल मरम्मत, कम्प्यूटर हार्डवेयर, टीवी मरम्मत, मोटर साईकिल, बड़ी गाड़ी मरम्मत आदि ऐसे प्रशिक्षण हैं पर जिन कर करोड़ों का खर्च नहीं आता है, बल्कि ऐसे प्रशिक्षण संस्थान महज कुछ लाख रूपयों से ही शुरू किया जा सकता है।

आदिवासी विकास परिषद के नेतृत्व में आदिवासी संस्कृति और विकास बोर्ड तथा डुवार्स तराई के विकास के लिए कार्यरत कई संस्थाओं को पिछले तीन चार वर्षों में करीबन 20 करोड़ रूपये प्राप्त हो चुके हैं। जिसे इन संस्थाओं ने गैर उत्पादक मदो में व्यय किया और समाज के हाथों कुछ पल्ले नहीं आया। यदि ये संस्थाएँ अपने बजट में से सिर्फ एक करोड़ रूपये प्रति वर्ष युवाओं के प्रशिक्षण के लिए डुवार्स तराई में कई प्रशिक्षण संस्थाएँ स्थापित करने के लिए खर्च करे तो डुवार्स तराई के युवाओं का बड़ा कल्याण होगा। लेकिन अफसोस की बात है कि ये संस्थाएँ गरीबों के घर बनाने के नाम पर दिखावा का कार्य करके समाज विकास के लिए मिले पैसे का दुरूपयोग करती है और अपनी अदूरदर्शिता का परिचय देता है।

किसी भी समाज में युवा वर्ग उस समाज की जीवंत संपदा होती है। लेकिन उनकी शिक्षा-दिक्षा, उत्साह-उर्जा का सही दिशा में नियोजन न हो तो वह संपत्ति कुड़ा में बदल जाता है। युवाओं को रोजगारमूलक प्रशिक्षण देने से उन्हें अधिक आय की नौकरी मिलने में सुविधा होती है और अपने हुनर का उपयोग वे अपने निजी व्यवसाय शुरू करके भी करते हैं। युवाओं को नौकरी मिलने से वे अपने घर-परिवार के शैक्षिक, सामाजिक, आर्थिक उन्नति में हाथ बँटाते हैं और एक आदमी के पर्याप्त आय से चार-पाँच लोगों की जिंदगी को बदलने में समर्थ होते हैं। समाज के अधिक युवाओं का रोजगारयुक्त होना समाज के विकासमय होने की निशानी है।

उन्हें प्रशिक्षण प्रदान करने में खर्च हुए पैसों को उत्पादन के सकरात्मक मद (आईटम) में हुए खर्च के रूप में देखा जाता है। प्रशिक्षित व्यक्ति प्रशिक्षण के बाद में लगातार उन्नति के मार्ग में अग्रसर होता है और इससे समाज आगे बढ़ता है। लेकिन समाज विकास के काम में मिले पैसों को गरीबों के घर बनाने में खर्च करने के कार्य को बुद्धिमानी का फैसला नहीं कहा जा सकता है, जैसे कि आदिवासी संस्कृति विकास बोर्ड फिलहाल कर रहा है। क्योंकि गरीबों को घर तो इंदिरा आवास और अन्य योजनाओं के अन्तर्गत भी बनाया जा सकता है। इसलिए ऐसे व्यय को अदूरदर्शी गैर उत्पादक व्यय कहा जाता है। समाज के लिए प्राप्त होने वाले रूपयों का सही और सटीक कार्य में उपयोग किया जाए यह जरूरी है। यदि इसमें भ्रष्टाचार का प्रवेश हो जाए तो वह बेहद दुखद होती है। ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई करना बेहद जरूरी हो जाता है।

चाहे सकरात्मक कार्य टी बोर्ड के द्वारा किया जाए, राज्य सरकार के द्वारा किया जाए या सामुदायिक संस्कृति विकास बोर्ड के द्वारा किया जाए, सबका स्वागत करना आवश्यक है। साथ ही विकास के नाम पर किए जाने वाले फिजुल खर्चों पर भी लगाम लगाने की जरूरत है। कम पैसों में भी समाज का कायाकल्प किया जा सकता है, इसका दृष्टांत टी बोर्ड दिखा रहा है। धन्यवाद टी बोर्ड। नेह इंदवार     

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