आदिवासी विकास पॉंचवी अनुसूची के रास्‍ते

नेह अर्जुन इंदवार

आदिवासी समाज युगों से ही एक आजादी पसंद समाज रहा है। वह न तो किसी राज्‍य शक्ति के अधीन कभी रहा था, न ही कोई राज्‍य शक्ति उसके सामाजिक, आर्थिक और सांस्‍कृतिक मूल्‍यों का नियंत्रक था। उस पर वह प्राकृतिक पूजक ही नहीं बल्कि स्‍वाभाव से भी प्राकृतिक जीवन जीने की कला का हमेशा कायल रहा है। वह कभी भी किसी आप्रकृतिक विचारधारा, सांस्‍कृतिक मूल्‍य और सिद्धांत के साथ जीवन जीना नहीं सीखा।

हर मानव स्‍वतंत्र पैदा होता है, लेकिन सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्‍कृतिक और धार्मिक समूह उस पर अपना नियंत्रण स्‍थापित करने का प्रयास जारी रखता हैं, क्‍योंकि बहुसंख्‍यक मानव ही उनकी सत्‍ता और शक्ति का स्रोत होता है। उत्‍पादन, वितरण और खपत पर मानव समूह का ही नियंत्रण होता है। इसीलिए मानवीय समूहों पर प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष नियंत्रण करके ही सभी शक्तियॉं अपनी सत्‍ता को बनाए रखती है।

युगों से आदिवासी समाज को किसी पराए सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक नियमों के तहत बंधने का कोई भी प्रयास पसंद नहीं था। आम आदिवासी दर्शन में समाज को जो कुछ भी प्राप्‍त था, वह सब कुछ प्राकृतिक का दिया हुआ, नैसर्गिक देन था। इसी प्राकृतिक विचारधारा से ओतप्रोत वह न तो जमींदारी प्रथा और न ही अंग्रेजो के द्वारा लादी गई मालगुजारी प्रथा को स्‍वभाविक ढंग से स्‍वीकार किया। भूमि, खेत खलिहान, जंगल, जल, नदी, पहाड, जीवन जीने की मर्जी आदि को प्राकृतिक (ईश्‍वर) का दिया हुआ मानता रहा है और कोई राजा, साम्राज्‍य अथवा किसी शासकीय सत्‍ता को कभी भी इसका मालिक नहीं माना। इन्‍हीं विशेषताओं के कारण आदिवासी समाज को एक स्‍वच्‍छंद, स्‍वतंत्रता पसंद जीवन का स्‍वामी माना गया है। गैर आदिवासी या बाहरी सामाजिक शक्तियॉं चाह कर भी प्रत्‍यक्ष रूप से अपने जीवन दर्शन को उन पर उनकी मर्जी के बगैर थोपने में नाकामयाब रहीं हैं।

सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में भारत के सभी आदिवासी क्षेत्रों में अंग्रेजों की राजसत्‍ता को आदिवासियों ने हथियारबंद चुनौती दिया था। जमींदारों और अन्‍य एजेंटों के माध्‍यम से अंग्रेज अपने शोषण-आधारित राज्‍य व्‍यवस्‍था, जीवन-दर्शन को उन पर लाद रहे थे। आदिवासी समाज से इन सभी का तीब्र विरोध किया गया।

1772-80 का पहाडिया विद्रोह, 1780-85 का तिलका माझी के नेतृत्‍व में संताल विद्रोह, 1795-1800 का तमाड और मुण्‍डा विद्रोह, 1798 का वीरभूम, बांकुडा का चौर विद्रोह, 1798-99 का मानभूम में भुमिज विद्रोह, 1800-02 में तमाड के दुखन मानकी के नेतृत्‍व में मुण्‍डा विद्रोह, 1819-20 में भुखन सिंह मुण्‍डा के नेतृत्‍व में हुए मुण्‍डा विद्रोह, 1832-33 में भागीरथी, दबाई गोसाईं और पटेल सिंह के नेतृत्‍व में हुए खेरवार विद्रोह, 1833-34 में वीरभूम के गंगा नारायण के नेतृत्‍व में भुमिज विद्रोह, 1855-60 के संथाल विद्रोह इसके उदाहरण हैं। उन्‍नीसवीं सदी के दौरान एक पैसे का मोल बहुत था और आदिवासी विद्रोह से अंग्रेज कितने हैरान परेशान या डरे हुए थे कि संथाल विद्रोह के नायक सिद्धू और उसके भाई कान्‍हू को पकडने के लिए उन्‍होंने दस हजार रूपया इनाम घोषित किया था। 1856-57 में बुधुबीर उरॉंव विद्रोह, 1870-80 में तेलंगा खडिया के नेतृत्‍व में हुए विद्रोह, 1874-99 को भगवान बिरसा मुण्‍डा के नेतृत्‍व में उठे उलगुलान आंदोलन, 1914 में गुमला के जतरा उरॉंव (भगत) के नेतृत्‍व में हुए टाना भगत आंदोलन, 1919 में डुवार्स के तेभागा-टाना भगत आंदोलन आदि में लाखों आदिवासियों ने अपने स्‍वतंत्रता और स्‍वराज को बचाए रखने के लिए बलिदान दिया।

उन्‍होंने अंग्रेज और उनके एजेंटों के वजूद को मिटाने के लिए अपना सर्वस्‍व न्‍यौछावर कर दिया था।
जमींदारी प्रथा और प्रशासन के माध्‍यम से आदिवासी अंचलों और समुदायों को नियंत्रित करने का प्रयास आदिवासी समाज की सार्वभौमिकता के लिए एक गहरा धक्‍का था। वे हैरान थे कि ये कैसे लोग और सिस्‍टम हैं जो हम आदिवासियों, हमारी अस्मिता और समाज को अपने नियं‍त्रणाधीन रखने का सजो सामान समझते हैं। ये लोग किस तरह और कैसे प्राकृतिक या ईश्‍वर का स्‍थान लेने का प्रयास कर रहे हैं। आदिवासी समाज में युगों से समता और समानता की भावना और मूल्‍य गहरे मन:स्थिति में पैठ चुकी थी। वे अपने को न तो किसी से ऊँच या श्रेष्‍ठ समझते थे न ही किसी को अपने से कमतर। दो मानव के बीच असमानता की भावना समाज में दूर-दूर तक नहीं थी। समाज में धर्म, संस्‍कृति, भाषा, खेती-पद्धति, शादी-विवाह, पर्व-त्‍यौहार, नृत्‍य-गीत, हॅसी-मजाक या शिकार जैसे सामूहिक कार्यो में कभी ऊँच-नीच, भेदभाव की परंपरा का विकास नहीं हो पाया। लेकिन पक्षपातीय भावनाओं और कमजोरों के शोषण पर आधारित सिद्धांत के द्वारा समाज को नियंत्रित करने की बाहरी दुर्गुणों को समाज हमेशा अस्‍वीकार किया और गैर-आदिवासी मूल्‍यों को थोपने की कोशिश करने वालों के प्रति समाज प्रतिहिंसक हो उठने तक अपनी भावना को प्रकट किया।

अपने जीवन पद्धति, स्‍वशासन और स्‍वतंत्रता के प्रति अत्‍यंत संवेदनशील आदिवासियों के हिंसक प्रतिरोधी आंदोलनों को ध्‍यान में रखते हुए अंग्रेजों ने आदिवासी क्षेत्रों के लिए शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक (The Scheduled District Act of 1874 (Act XIV of 1874) बनाया। शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक के लिए ब्रिटिश शासन व्‍यवस्‍था के तहत सेंट्रल और प्रोविंसियल लेजिस्‍लेटिव को कानून बनाने का हक नहीं था। लेकिन गवर्नर-इन-कौंसिल को हक था कि वह सेंट्रल और प्रोविंसियल कौसिलों के द्वारा पारित किसी भी कानून को शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक में लागू करने का आदेश दे सकता था, किन्‍तु गवर्नर जनरल के द्वारा उक्‍त कानून के किसी भाग के अपवाद और संशोधन (subject to such exceptions or modifications as the Governor thinks fit) की अनुमति होने के बाद। Montague-Chelmsford Reforms treated में इन्‍हीं क्षेत्रों को Backward Tracts कहा गया और भारत सरकार अधिनियम 1919 को इन क्षेत्रों में लागू करने से रोका गया ।

भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बढ रहे असंतोष को कुंद करने के लिए बनाए गए सुधारवादी कानूनों को आदिवासी क्षेत्रों में लागू नहीं किया। अंग्रेजों का मत था कि अगडी भारतीय समुदाय सुधारवादी कानूनों की आड में पिछडे आदिवासी क्षेत्रों में शोषण करेंगे और उससे उपजे असंतोष की भावना से ब्रिटिश शासन को नुकसान पहॅुंचेगा। लेकिन कुछ समय उपरांत इन क्षेत्रों (शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिकों) को दो भागों में बॉट कर कुछ भागों में आंशिक रूप से सुधारवादी कानूनों को लागू किया गया। इन्‍हीं दो भागों को भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत साइमन कमिशन के सुझाव के अनुसार Excluded Areas and Partially Excluded Areas कहा गया और प्रस्‍ताव दिया गया कि इन क्षेत्रों का प्रशासन प्रांतीय सरकार से लेकर भारत सरकार के हाथों में दिया जाए। इन क्षेत्रों में गवर्नर जनरल की विशेष अनुमति के सिवा कोई भी साधारण कानून, अपवादों और संशोघन के शर्तो के सिवाय, लागू नहीं होता था। इन क्षेत्रों में किसी भी कानून को तब तक लागू नहीं किया जा सकता था, जब तक कि स्‍वयं गवर्नर जनरल अपने विवेकाधीन शर्तो के सहित अनुमति न दें। इन्‍हीं क्षेत्रों में ही देश की आजादी के बाद पॉचवी अनुसूची के प्रावधानों को लागू किया गया । उत्‍तरपूर्वी राज्‍यों को छोडकर देश के अन्‍य हिस्‍सों में बसने वाले अनुसूचित जनजाति के सांस्‍कृतिक, सामाजिक, प्राकृतिक, राजनैतिक, आर्थिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए संविधान की धारा 244 (1) के उपबंध बनाए गए।

शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक बना कर आदिवासियों को साधारण कानून से मुक्‍त रखने का प्रमुख कारण था कि प्रगतिशील समाजों पर शासन करने के लिए बनाए गए कानून और उसके नियम काफी दुरूह, जटिल और विभिन्‍न प्रकार से व्‍याख्‍या पर आधारित होते हैं। उन कानूनों और नियमों के सहारे कानून की बारीक जानकारी रखने वाले समाज या समूह उन्‍हें अपने शोषण का माध्‍यम बना सकते हैं। शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक बना कर एक ओर उन्‍हें कानूनी दॉव पेंच और मुकादमेबाजी के वातावरण से बचाया गया, दूसरी ओर उन्‍हें इसके माध्‍यम से स्‍थानीय शासन स्‍वयं चलाने के लिए ऑटोनोमस दिया गया।
Gazette of India, 1881,Pt.I p.74 के अनुसार The Scheduled Districts Act, 1874 (14 of 1874), के द्वारा जलपाईगुडी जिला के पश्चिम जलपाईगुडी और पश्चिमी डुवार्स को शिड्यूल्‍ड डिस्ट्रिक के रूप में घोषित किया गया था। उल्‍लेखनीय है कि रंगपुर जिला के उत्‍तरी भाग और पश्चिम डुवार्स (वर्तमान डुवार्स अंचल) (असम के ग्‍वालपाडा आदि कुछ जिले कभी पूर्वी डुवार्स के रूप में जाने जाते था) को मिला कर 1869 में जलपाईगुडी जिले का गठन किया गया था। तब तक डुवार्स तराई में अनेक चाय बगान बन चुके थे और यहॉं छोटानागपुर, संथाल परगाना के मजदूर स्‍थायी रूप से बस गए थे। उल्‍लेखनीय है कि शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक एक्‍ट 1874 के द्वारा ही छोटानागपुर डिविजन के हजारीबाग, रॉंची, पलामू, मानभूम, परगना ढालभूम और सिंहभूम के कोल्‍हन क्षेत्र को भी शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक के रूप में घोषित किया गया था। तब बिहार और उडिसा राज्‍य ब्रिटिश बंगाल का ही हिस्‍सा था और छोटानागपुर के जिले और जलपाईगुडी जिला आदि ब्रिटिश बंगाल प्रांत का ही भाग था। उन्‍नीसवीं सदी में छोटानागपुर (रॉंची, हजारीबाग) संथाल परगाना के आदिवासी काम की खोज में किसी अन्‍य प्रांत में नहीं गए थे, बल्कि अपने ही प्रांत अर्थात तत्‍कालीन बंगाल के अन्‍य जिले अर्थात् जलपाईगुडी और दार्जिलिंग में काम करने आए थे। दूसरे शब्‍दों में बंगाल के आदिवासी मूल रूप में बंगाल के ही वासिंदे हैं और आदिवासी धर्म, भाषा, संस्‍कृति आदि बंगाल की मिट्टी की पैदाइश है।
भारतीय शासन व्‍यवस्‍था के विकेन्‍द्रीकरण, आदिवासी समाजों की विशिष्‍ट पहचान और सांस्‍कृतिक सम्‍पदा को बचाए रखने, उनके सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक हितों की रक्षा करने के लिए संविधान निर्माताओं ने देश के आदिवासी क्षेत्रों को दो हिस्‍सों में बॉंटा। Excluded and Partially Excluded Areas को अनुच्‍छेद 244 (1) (पॉंचवी अनुसू‍ची) तथा अनुच्‍छेद 244 (2) छटवीं अनुसू‍ची) (ट्रायबल क्षेत्र) के प्रावधानों के अन्‍तर्गत उन्‍हें स्‍वायतता प्रदान किया गया।

डुवार्स और तराई के आदिवासी चाय अंचलों में बसे हैं। उनकी बदहाली और विपन्‍नता किसी से छिपी नहीं हैं। वे दिहाडी आय पर सम्‍पूर्ण रूप से निर्भर हैं और इन्‍हीं रोजगार के साधनों पर प्रत्‍यक्ष अथवा अप्रत्‍यक्ष रूप से अंकुश रखकर आज आदिवासी समाज पर नियंत्रण रखा जा रहा है। उन्‍हें सीमित आय पर रहने के लिए मजबूर करके उनकी शिक्षा, संस्‍कृति, सामाजिक और अन्‍य आर्थिक कार्यकलापों पर सीधा नियंत्रण रखा जा रहा है। एक आजाद देश में गुलाम जनता कैसी होती है, उसका यह एक जीता जागता उदाहरण है। चाय अंचल के कल्‍याण के लिए टी प्‍लांटेशन एक्‍ट लागू किया गया है। लेकिन वह कागजों में सीमित है। डुवार्स तराई के 300 चाय बागानों में शायद ही कोई एक ऐसा बागान होगा, जिसमें टी प्‍लांटेशन एक्‍ट का उल्‍लंघन न किया गया हो। लेकिन आज तक किसी बागान या प्रबंधन के विरूद्ध कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। Employees provident Fund के अरबों रूपये के गबन में दिखावे के लिए भी कार्रवाई नहीं की गई। चाय बागानों में शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य का कोई पुख्‍ता प्रबंध नहीं, लेकिन लेबर कमिशन और प्रशासन ऑखें बंद किए बैठा है। ऐसा लगता है, राज्‍य सरकार के इन कल्‍याणकारी विभागों का विवेक भी चाय बागानों की तरह ही बदहाल है। मजदूरों को नेतृत्‍व प्रदान करने का दावा करने वाले श्रमिक संघ हर बार न्‍यूनतम वेतन से कम में वेतन समझौता करके अपनी काबलियत का प्रदर्शन करते रहे हैं। आदिवासी कल्‍याण के नाम पर करोडों रूपये बहा कर भी राज्‍य सरकार के दूरदर्शी विवेकवान प्रशासकगण आदिवासी क्षेत्रों में विकास की नदियाँ बहाने में नकाम रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में आदिवासी जनता आजादी के बाद ही दोयम दर्जे का व्‍यवहार पाती रही है। संविधान की पॉचवीं अनुसूची के अन्‍तर्गत 25 अगस्‍त 1953 को Tribal Advisory Council का गठन किया गया था। लेकिन Tribal Advisory Council ने आदिवासी हित में क्‍या-क्‍या निर्णय लिया या पश्चिम बंगाल के राज्‍यपाल को क्‍या-क्‍या परामर्श दिया, यह आज तक आदिवासी जनता जान नहीं पाई है। पश्चिम बंगाल में Tribal Advisory Council तो बना दिया गया, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों को स्‍वशासन देने के लिए कोई कदम नहीं बढाया गया और किसी भी आदिवासी क्षेत्र को शिड्युल्‍ड एरिया घोषित नहीं किया। इसका मतलब यही हुआ कि आदिवासी संस्‍कृति, भूमि, भाषा, समाज को शोषण से बचाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। जबकि राज्‍य के प्रशासन को संविधान द्वारा यह निर्देशन स्‍पष्‍ट रूप से दिया गया था। यदि आदिवासी क्षेत्रों को श्डियुल्‍ड एरिया घोषित किया जाता तो उनका हाल आज इतना खराब नहीं होता। संविधान में विशेष उपबंध रहते हुए भी आदिवासी समाज को सामान्‍य कानूनों के हवाले कर दिया गया। इसका प्रतिफल यह हुआ कि आदिवासी समाज शोषण के एक अंतहीन चक्र में फंस कर अपना सर्वस्‍व खोता रहा। ममता मुखर्जी की नई सरकार के द्वारा 14 मार्च 2012 को Tribal Advisory Council के नियम में संशोघन जारी किया गया, लेकिन अभी तक इसके गठन की घोषणा नहीं हुई है। आदिवासी समाज के हित में काम करने वाले करीबन सभी संगठनों को इस बात का पता है, लेकिन किसी भी संगठन ने अब तक इस बात को पुख्‍ता अंदाज में नहीं उठाया है। आदिवासी समाज को नेतृत्‍व प्रदान करने वाले पॉचवी अनुसूची के बदले वर्षो तक छटवीं अनुसूची की मांग करते रहे हैं। संविधान में उपयुक्‍त संशोधन के बिना कोई भी सरकार चाह कर भी छटवीं अनुसूची के उपबंधों को पश्चिम बंगाल के आदिवासी अंचलों में लागू नहीं कर सकती है। पता नहीं किसने छटवीं अनुसूची का राग छेड कर इतना समय और उर्जा का अपव्‍यय करवाया और भोलेभाले आदिवासी जनता को गलत ख्‍वाब दिखलाया।

एक समय था जब आदिवासी समाज किसी का गुलाम नहीं था। लेकिन आज तो सभी लोग आदिवासी समाज को अपना गुलाम बनाना चाहते हैं। गैर आदिवासी तथा अपने स्‍वार्थ में लिप्‍त ताकतें तो आदिवासियों को सामाजिक, सांस्‍कृतिक, भाषाई, आर्थिक और सामाजिक रूप से गुलाम बनाना ही चाहती हैं और बहुत हद तक वे कामयाब भी रहे हैं। लेकिन विडंबना की बात तो यह है कि अनेक आदिवासी भी अपने व्‍यक्तिगत लाभ के लिए उन्‍हें गुलाम बनाए रखना चाहते हैं। आज आदिवासियों के वोट, उनकी ताकत और एकता को अपने व्‍यक्तिगत व्‍यावसायों को सपोट करने, अपनी ठेकेदारी को मजबूती देने के लिए ही कई लोग आदिवासी समाज का नेता बनना चाहते हैं और वे इसमें कामयाब भी रहे हैं। ऐसे लोगों की दिली ख्‍वाहिश है कि आदिवासी जनता उनके कदमों के नीचे ही रहे।

भारत के अनेक राज्‍यों में पॉंचवी अनुसूची के प्रावधानों को लागू करके आदिवासी समाज को शोषण से बचाने के लिए संवैधानिक संरक्षा दी गई है। पश्चिम बंगाल में आदिवासियों की दशा और दिशा अत्‍यंत शोचनीय है इसमें दो राय नहीं है। पश्चिम बंगाल के आदिवासियों के कल्‍याणार्थ पॉंचवी अनुसूची के प्रावधानों के अन्‍तर्गत ट्राइबल एडवाजरी कौंसिल का गठन भी किया जाता है। संविधान में राज्‍यपाल को आदिवासियों का संरक्षक कहा गया है। आदिवासी समाज में निरंतर बढ रहे शोषण और उससे उपजे असंतोष को दूर करने के लिए आदिवासी अंचलों को शिड्युल्‍ड एरिया बनाना आज समय की मांग है। जो आदिवासियों का सच्‍चा हितैषी होगा वह इस मांग से असहमत नहीं होगा। 1874 में आदिवासी जनता को शोषण और अन्‍याय से बचाने के लिए शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक बनाया गया था। लेकिन आज तो आदिवासियों की हालत सर्वाधिक शोषित और वंचित है ऐसे में संविधान में उनके उपचार के लिए बनाए गए प्रावधान ही सच्‍चे रूप से आदिवासी जनता का उद्धार कर सकता है और यह उद्धार सिर्फ पॉंचवी अनुसूची को लागू करके ही हो सकता है।♠ This work is copyright Neh Arjun Indwar Dec. 2016. All rights reserved

निठल्ला चिंतन

नेह अर्जुन इंदवार

ईश्वर ने पृथ्वी समेत पूरे ब्रह्माण्ड को बनाया (मनुष्‍य पूरे विश्वास से हजारों वर्षों से जम कर ऐसा सोचता रहा है) इस पर जम कर मोटी मोटी किताबें भी लिखी गई है।

मनुष्य अजब-गजब कमाल का प्राणी है। वह ब्रह्मांड के खरबों गैलेक्सी और एक-एक गैलेक्सी में समाए खरबों तारे और उससे भी अधिक ग्रहों, उपग्रहों और क्षुद्रग्रहों को बनाने वाला को पूरी तरह जानने समझने का दावा करता है। वह ईश्वर, परमेश्वर को भूमिहीन, आवासहीन, सहज में खुश होने वाला और आदमी के कुकर्मों को कुछ पैसे देकर और क्रंदन भरा प्रार्थना सुनकर क्षमा करने वाला रिश्वतखोर भी समझता है।

आदमी के पास कल्पना में विचरण करने वाला एक शानदार खोपड़ी है। उसकी परिकल्पना आकाश में लगातार उड़ान भरते रहती है। वह पल भर में इधर से उधर उड़ते रहती है। उसकी कल्पना ने ठान लिया कि परमेश्वर उसकी तरह ही दोपाया वाला है। इसलिए वह ईश्वर के मूर्ति को अपने कदकाठी के अनुसार बनाता है उसके चेहरे को आदमी का बना कर फिल्मी हीरो हीरोइनों की तरह तीखे नक्श नैन वाला भी बनाता है। उसका रंग गोरा या काला या सांवला बना कर अपने विश्वास और कल्पना को थपथपाता है।

उसे लगता है कि ईश्वर तो उसके जैसे ही होगा। वही दो हाथ, दो पैर और दो आँखे वाला। आदमी अपने रूप को ही संसार का सबसे सुंदरतम और श्रेष्ठतम रूप और वजूद का मानता है। इसीलिए वह ईश्वर के मूर्ति को अपने कदकाठी के अनुसार बनाता है उसके चेहरे को आदमी का बना कर फिल्मी हीरो हीरोइनों की तरह तीखे नक्श नैन वाला भी बनाता है। उसका रंग गोरा या काला या सांवला बना कर अपने विश्वास और कल्पना को थपथपाता है।

चुटकुलानुमा सोच की बानगी देखिए कि आदमी कहता है ब्रह्मांड में सिर्फ एक ही परम शक्तिशाली, परम सृजनशील परमेश्वर है, बाकी सब उसके अधीन के प्रजानुमा गुलाम प्राणी हैं। वह उस परम शक्तिशाली, परम सृजनशील आदमी (?)को पूरी तरह जानने, पहचानने का दावा भी करता है। मनुष्य को अपने घर में रह रहे चिंटियों या सिर के बाल में घुम रहे जूँए तक के बारे कुछ नहीं पता रहता है, लेकिन कई खरब प्रकाश वर्ष की दूरी में किसी नये गैलेक्सी के निर्माण में व्यस्त ईश्वर के बारे सब कुछ जानने का अहंकार रहता है।

चिड़ियाँ, तितलियाँ और शेरों को आदमी के इस विश्वास और कल्पना के बारे कुछ इल्म है या नहीं, अभी तक पता नहीं चला है। या उनके भी ईश्वर चिड़ियों, तितलियों और शेरों की तरह ही है। पता लगाना बहुत मुश्किल चिड़ियाँ और तितलियाँ मनुष्य को देख कर दूर भागती हैं और मनुष्य शेर को देख कर। वार्तालाप करने की गुँजाईश ही नहीं है।

हँसते हँसते पेट में बल पड़ जाते हैं जब आदमी कहता है कि उसे उस परम सृजनशील के बारे सभी कुछ पता है मसलन उसने कब जन्म लिया, कैसे जन्म लिया, बचपन में क्या करता था, भरी जवानी में क्या-क्या गुल खिलाया, बुढ़ापे में क्या-क्या मजेदार क्रिया करम किया ?? आदमी तो यह भी कहता है कि परमेश्वर स्वर्ग में क्या करता है, कैसे उठता है बैठता है, दाएँ -बाएँ किनके साथ रहता है ?? क्या खाता है ? क्या पहनता है? रेश्मी या कृत्रिम रेशे से बुने गए किसी ब्रांडेड कंपनी के कपड़े पहनता है या बिना कपड़े के । आदमी ईश्वर के बारे भूतकाल की ही बातें कहता है, या फिर सुदूर भविष्य की। वर्तमान काल में ईश्वर की बातें करने में मनुष्य को शर्म लगता है।

आदमी का सोच कितना बालसुलभ है, बुद्धिमत्ता का स्तर क्या है ?? कल्पना की उड़ान तो खैर ..

आदमी नामक क्षणभंगुर प्राणी अजर अमर ब्रह्माण्ड के निर्माता को दिल और दिमाग से पूर्ण भूमिहीन, आवासहीन समझता है और अपने प्यार उढ़ेलते हुए परमेश्वर के लिए खूब धन व्यय करके अपने पड़ोस में सुंदर इमारत का निर्माण करता है। ईट सीमेंट और पत्थरों से बने इमारतों को खूब सजाता है और उसका मेकअप करता है। वह बहुमूल्य पत्थर और कपड़ों से इमारत को सजा कर उस इमारत को धनवान बनाता है और उस परमेश्वर को वहाँ विराजमान करता है। परमेश्वर को सुनाने के लिए वह बकायदा बड़े-बड़े माईक लगाता है और सुबह शाम कानफोड़ू आवाज़ में ईश्वर को जगाता है। गाना सुनाता है, उसे नाच दिखाता है। आदमी अपने इस कार्य को परम बुद्धिमानी का काम कहता है। अनेक लोगों का पेट यही काम करने भरता है। अनेक लोगों को ऐसे काम करने पर बिना परिश्रम खाने-पीने की कोई कमी नहीं रहती है।

उसे खुश करने के लिए आदमी फल, फूल पकवान भी रखता है। अधिक खुश करने, भक्ति दिखाने के लिए डांस भी करता है। कई तो उनकी प्रसन्नता और स्वस्थ होने या बीमार होने की बातें भी जानते हैं और ब्रह्मांड के निर्माता को इंजेक्शन देने, खाना-पीना देने का जतन भी करते हैं।

सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने का दावा करने वाला आदमी ईश्वर का कई-कई पेट नाम या उपनाम भी रखता है। ब्राह्मंड के स्वामी, लेकिन बेघर-बार ईश्वर के लिए ठाठ -बाट का घर बना कर ईश्वर पर एहसान करने का घमंड भी करता है। अहा ! ये पैसे वाला दयावान आदमी न होता तो ईश्वर को किसी सड़क के किनारे खुले आसमान तले बेनाम और बेघर होकर रात (दिन) बिताना पड़ता। बेचारे, सड़क के प्राणी को कोई पूछता है भला!!

सबसे दिलचस्‍प बात तो यह है कि वह ईश्‍वर को इन घरों में बंद करके बड़े बड़े ताला भी लगाता है और सुरक्षा गार्ड भी तैनात करता है। क्या ईश्वर का बंदीगृह से निकल कर कहीं भाग जाने की आशंका रहती है ? भगोड़ा ईश्वर कहीं सचमुच भाग ही न जाए ?

आदमी की भक्ति इतनी कि इन ईमारतों में आने पर वह अपनी जेब की कुल मुद्रा (मुद्रा बोले तो रूपये पैसे) में से “अत्यंत थोड़े” से रूपयों पैसों को ईश्वर को देता है। आदमी रूपया पैसा न दे तो बेचारा ईश्वर का क्या हाल होगा ?? जरूर गरीब हो जाएगा !!

गरीबी में दिन गुजारना किसे कहते है !!!! इसका दूसरा मतलब है सब चंदे या दान दे दे कर उन्हें धनवान बनाते हैं। इन पैसों से परमेश्वर जरूर किसी गैलेक्सी में खाने पीने का सामान खरीदते होंगे ?

ये ईश्वर का घर भी अलग-अलग होता है। औने-पौने छोटे-मोटे सड़क किनारे के पर्मेश्वरालय (परमेश्वर का घर) का परम ईश्वर दुबला पतला, कमजोर और मरियल सा होता है, इसलिए आदमी इन सड़क छाप पर्मेश्वरालय में जाने से कतराते हैं। वे तो दूर देश के बड़े और शानदार प्रसिद्ध ईश्वरालय में जाते हैं या किसी कठिन पहाड़ की चढ़ाई चढ़ने के बाद पहाड़ के उस पार रहने वाले ईश्वर के पास जाना पसंद करते हैं। शायद वहाँ का ईश्वर ज्यादा मोटा ताजा शक्तिशाली होता है। वहाँ की भीड़ बताता है कि वहाँ का ईश्वर कितना बलशाली है। तीर्थ यात्रा में मोटी रकम खर्च करने पर ईश्वर बहुत खुश होता है। स्वर्ग में इससे मृत्यू पूर्व ही आरक्षण मिल जाता है।

आदमी कहता है पूरे ब्राह्मंड में सिर्फ और सिर्फ एक ही ईश्वर है। लेकिन क्यों कुछ ईश्वरालय मरियल सा होता है और कुछ बलशाली ?? कुछ का हाल खास्ताहाल तो कुछ 27 मंजिली जगमगाता अंटिलिया जैसा ??

कुछ लोगों को यह चक्करघिन्नी लगता है।

चक्करघिन्नी की बात को कौन समझाए !!!

संसार का सर्वश्रेष्ठ सृष्टि बुद्धिमानप्राणी मनुष्‍य ।

आदमी का काम क्या है कमजोर ईश्वर का रखवाली करना ?
बेघर-बार ईश्वर के लिए मकान बनाने वाला ?

ईश्वर क्या-क्या करता है? कैसे उठता है, बैठता है, कैसे खुश होता है, कैसे नाराज होता है, के बारे विस्तार पूर्वक खबर रखने वाला और उस पर किताबें लिखने वाला। बड़ी बात उन किताबों को असली और सच्चा ईश्वरीय घोषित करने वाला? उन सच्चाईयों को सबको बताने वाला? प्रचार-प्रसार करने वाला? ईश्वर के नाम पर चंदा इकट्ठा करने वाला? ईश्वर के नाम पर तलवार चलाने वाला?

मतलब परमेश्वर महान नहीं बल्कि उसका मालिक आदमी है महान।

खुरदुरा चिंतन चल रहा है।
उधर कुछ बच्चे पापा-मम्मीका खेल बहुत गंभीरता से खेल रहे हैं। लकड़ी और पत्थर के बच्चों को नहला रहे हैं, उन्हें भोजन करा रहे हैं और उन्हें प्यार करते हुए लोरी सुनाते हुए सुला रहे हैं।

इधर आँखें मिंचे सोच चिंतन में व्यस्त हैं नेह।

Published on:15 Dec 2018 @ 12:29