कम वेतन पर मजदूर काम नहीं करेंगे चाय बागानों में

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 नेह अर्जुन इंदवार

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दार्जिलिंग टी एसोसिएशन से जुड़े संदीप मुख्योपाध्यय के अनुसार दार्जिलिंग के पहाड़ों में स्थित चाय बागानों में पिछले एक साल से 50 प्रतिशत चाय मजदूर अपने काम में नहीं आ रहे हैं। इसका चाय उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ा है और चाय उद्योग टूटने के कगार कर पहुँच चुका है। उनके अनुसार जब बागानों में 100 दिन रोजगार का काम शुरू हुआ था तो मजदूरों की अनुपस्थिति 20-25 प्रतिशत था, लेकिन अब वह बढ़ कर आधा हो गया है। सरकारी योजना के तहत चलाए जा रहे 100 दिन रोजगार में मजदूरों को 192 रूपये मिलते हैं, जबकि चाय बागानों में 176 रूपये। जाहिर है  कि अपने श्रम का मूल्य जहाँ अधिक मिलेगा, मजदूर उधर ही जाएँगे। कोई भी समझदार इंसान जानबुझ कर अपने शारीरिक श्रम और आर्थिक शोषण को नहीं चुनेगा।   

हाल ही में (नंवबर महीने के तीसरे हप्ते)  कोलकाता में सरकार, मालिकपक्ष और कुछ चुनिंदा मजदूर संघों के प्रतिनिधियों के बीच चाय उत्पादन बढ़ाने और मजदूरों से नियमित रूप से आठ घंटे काम लेने के विषय पर एक चर्चा हुई। मालिक पक्ष का कहना है कि वे सार्वजनकि अवकाश या सरकारी अवकाश- जैसे कालीपूजा, दुर्गापूजा, होली, गणतंत्रता और स्वतंत्रता दिवसों  पर मजदूरों को मजदूरी का भुगतान करते हैं। इससे उनके आर्थिक दशा पर प्रभाव पड़ता है। मालिक पक्ष इन छुट्टियों को समाप्त करना चाहते हैं या इसे कम करना चाहते हैं। 

उत्पादन बढ़ाने के लिए बुलाई गई इस बैठक का लब्बोलुआब यह था कि न्यूनतम वेतन अधिनियम के अन्तर्गत मजदूरों को वेतन देने से चाय बागानों को आर्थिक नुकसान होगा और उस नुकसान को पूरा करने के लिए मजदूरों से अधिक कार्य लेना पड़ेगा और उनकी दी गई सुविधाओं में कटौती करनी होगी। मजदूरों से हर हालत में 8 घंटे काम लिया जाएगा। मतलब  न्याय पूर्ण मजदूरी मांगने वाले चाय बागान मजदूरों को सबक सिखाया जाएगा। चाय बागान प्रबंधक और चाय बागान मजदूरों के वेतन में कितना अंतर है इस बात को कभी भी चाय बागान के आर्थिक हित वार्ता में कभी चर्चा नहीं की जा सकती है। 

दार्जिलिंग में चाय बागानों में काम करने वालों की संख्या कम हो गई है और डुवार्स में भी यही होने वाला है। भला 176 रूपयों में कौन 8 घंटा अपने खून पसीना को एक करके मालिकों को लाभ देना चाहेगा ?  जबकि चाय बागानों के बाहर मजदूरों को डुवार्स तराई में ही 400-500 रूपये अपने शारीरिक श्रम के बदले मजदूरी आसानी से मिल जाते हैं।

दार्जिलिंग के चाय बागानों में शिक्षा दर बढ़ गया है और डुवार्स तराई में भी क्रमशः यह बढ़ ही रहा है। अनपढ़ों और विकल्पहीन मजबूर लोगों का आर्थिक शोषण करना सहज है लेकिन चेतनाशील, शिक्षित और अन्य विकल्पों से लैस लोगों का अब चाय बागानों में शोषण होना मुश्किल है।

यदि चाय बागानों को बचाना है तो सरकार और चाय बागान मालिकों को इंसानियत और ईमानदारी का परिचय देना होगा और चाय मजदूरों के आर्थिक शोषण के लक्ष्य को दिमाग से निकालना होगा। फिलहाल तो नहीं लगता है कि चाय बागान मालिकों और पश्चिम बंगाल सरकार के पास चाय मजदूरों के लिए इंसानियत भरा कोई हमदर्दी है।

न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने के पूर्व मजदूरों को मिलने वाली सभी सुविधाओं को मालिक पक्ष छीन लेना चाहता है और सरकार इस काम में मालिक पक्ष के साथ खड़ी नजर आती है। क्या सरकार को मालूम है कि चाय मजदूरों को रविवार या साप्ताहिक के अवकाश के लिए कोई मजदूरी नहीं मिलती है, जबकि रविवार का अवकाश सरकारी नीतियों और नियमों के तहत दी जाती है और सभी संगठित उद्योगों में मजदूरों को साप्ताहिक अवकाश के लिए भुगतान किया जाता है।

चाय बागान के मजदूर स्थायी मजदूर हैं और उन्हें पीएफ, ग्रेज्यएटी, मातृत्व अवकाश आदि अनेक कानूनी सुविधाएँ हासिल हैं, लेकिन उन्हें साप्ताहिक अवकाश के लिए कोई भुगतान नहीं किया जाता है। साल में कुल 52 सप्ताह होते हैं और चाय मजदूरों को इन 52 दिनों का कोई भुगतान नहीं मिलता है। लेकिन वे राष्ट्रीय और धार्मिक अवसरों पर दिए जाने वाले अधिकतम 15 दिनों की छुट्टियों के भुगतान को समाप्त करना चाहते हैं। आखिर क्यों ?  क्या दूसरे उद्योग और क्षेत्रों में स्थायी मजदूरों को ये अवकाश नहीं मिलते हैं ? चाय बागानों के मजदूर अधिकतर आदिवासी मजदूर हैं और वे दुर्गापूजा, कालीपूजा, होली दिवाली नहीं मनाते हैं। ये पर्व तो मालिक पक्ष मनाते हैं और अपनी धार्मिक और सांस्कृतिक जरूरतों को पूरा करते हैं।

यदि मजदूरों से वे इन पर्वों के बदले दिए जाने वाले भुगतान को छीनना चाहते हैं तो मजदूरों को हक है कि वे इन पर्वों के समय भी बागान में काम करें और सिर्फ अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक पर्व त्यौहार करम, जितीया, नवाखानी, सरहुल बड़ादिन आदि के अवसरों पर छुट्टी रखें। या जो मजदूर जिस धर्म को मानता है, उस धर्म के अनुसार वह मजदूरी त्याग करके अपना अवकाश खुद तय करें। जब बागान मालिकों के पर्व त्यौहारों पर सवेतन अवकाश न मिले तो वे क्यों अपनी मजदूरी को उनके पर्व त्यौहारों पर बलिदान दे दें।

चाय पत्ती सीजन में एक मजदूर को मजदूरी पाने के लिए सामान्यता 24 किलोग्राम पत्ती तोड़ना होता है। 4.5 केजी पत्ती से एक किलोग्राम तैयार चाय बनती है। मतलब हर मजदूर रोज 24  4.5=5.33 केजी चाय बागान मालिक को बना कर देता है। नीलामी में औसतन प्रति केजी चाय न्यूनतम 151 रूपये में बिकता है। इसका मतलब है एक मजदूर रोज 804.83 रूपये कमा कर मालिक को देता है। बागान मालिक एक मजदूर से मजदूरी काट कर 628.83 रूपये कमाता है। यदि अन्य मद में 100 रूपये का लागत खर्च हो भी जाता है तो भी मालिक को 528.83 रूपये कमाई रोज होता है। लेकिन मालिक इतनी कमाई से संतुष्ट नहीं है वे मजदूरों के पॉकेट में हाथ डालना चाहते हैं ताकि उनकी अबाध कमाई बनी रहे।

जब मजदूर न्यूनतम वेतन अधिनियम के तहत न्यायपूर्ण मजदूरी की मांग कर रहे हैं तो मालिक पक्ष और सरकार उन्हें नकद राशि के रूप  में कुछ अधिक मजदूरी थमा कर उसकी वसूली अन्य तरीके से करने का दुष्चक्र कर रहे हैं। यह अत्यंत निंदनीय है। जबकि मालिक PLA (The Plantation Labour Act)  और  WBLR (West Bengal Labour Plantation Labour Rules) में लिखी गई अनेक बातों को कटौती करके पहले से ही मजदूरों का हक मार कर अपने मुनाफे में वृद्धि करने के अनेक रास्ते से लाभ बढ़ाने के उपाय ढूँढ चुकी है।

अस्पतालों में एमबीबीएस डाक्टर और प्रशिक्षित नर्स गायब हैं। जीवन रक्षक औषोधियौं की कितनी खरीदी की जाती है इसके क्या आंकड़े हैं ?  मजदूरों के पीएफ, ग्रेज्युएटी, आवास, रोड, नाली, मरम्मत के पैसे आदि की गबन कोई नई बात नहीं है। लकड़ी राशन, पानी बिजली के नाम पर मजदूरों को क्या सुविधाएँ मिलती है यह किसी से छुपी हुई नहीं है। मजदूरों में यूनिवर्सल पोषण की कमी सभी बातों को स्पष्ट रूप से बयान करती है।

चाय बागानों के चाय बनाने की प्रक्रिया में बागान मैनेजर कितना ध्यान रखते हैं? मजदूर कितनी मात्रा में चाय बागानों में उर्वरक और पेस्टिसाईड आदि का इस्तेमाल करते हैं इसे मैनेजर कितना देख पाते हैं ? आखिर यूरोपीय बाजार में भारतीय चाय यूरोपीय मानक में क्यों फेल हो जाते हैं ? यद्यपि भारतीय बाजारों में डुवार्स तराई के चाय की कीमत दूसरे राज्यों से अधिक होती है, लेकिन उनकी गुणवत्ता तय मानकों में खरा नहीं उतरती है और उसे निर्यात के लिए उपयुक्त नहीं समझा जाता है। क्या इन सभी त्रुटियों का का दोष मजदूरों का है ?

चाय बागान मालिक मजदूरों के कानूनी सुविधाओं और हक को मार कर मुनाफा कमाने के रास्ते को अपना हक और अधिकार समझते हैं जो उनके पेशेवरहीन होने का ऐलान करता है। पश्चिम बंगाल सरकार का श्रम विभाग उनके शोषण षडयंत्र को पूरी सहायता प्रदान करता है।  यदि चाय बागान प्रबंधन चाय बागानों में उत्पादन प्रक्रिया को गंभीरता से लेंगे और उच्च गुणवत्ता वाली चाय का उत्पादन करेंगे तो डुवार्स तराई के चाय 500-1500 रूपये से अधिक दाम में बिक सकते हैं। लेकिन बागान मालिक अपने उत्पादन को सुधारने कर आय बढ़ाने के प्रयास करने की जगह मजदूरों के जेब पर ही हाथ डालने का षड़यंत्र रच रहे हैं।

मजदूरों के शोषण को यथावत बनाए और उन्हें दीनहीन स्थिति में रखने का दूरगामी प्रभाव चाय उद्योग को बर्बाद कर देगा। क्योंकि तब चाय मजदूर चाय बागानों के कार्य से पूरी तरह विदा ले लेंगे और इससे अधिकतर बागान रूग्ण हो जाएँगे और अंततः बंद बागान में तब्दिल हो जाएँगे। तब दार्जिलिंग के चाय बागान हों या डुवार्स तराई के सभी जगह चाय के पौधे जंगल में तब्दिल हो जाएँगे और इन इलाकों के लोग चाय से नफरत करने लगेंगे। शोषक और अत्याचारी को दुनिया के किसी भी भाग में सम्मान नहीं मिलता है।

चाय बागान मालिक मजदूरौं के अधिकार और सुविधानों में कटौती करने के लिए प्रस्ताव पर प्रस्ताव दिए जा रहे हैं, लेकिन मजदूर संघ के पदाधिकारी अपना मूँह बंद करके रख रहे हैं। क्या वे नयी नवेली दुल्हन हैं जो मूँह को घुंघट से ढक कर रखती है।  ऐसा लगता है वे मजदूरों के हित में काम नहीं करते हैं बल्कि मालिकों के हित रक्षा के लिए मजदूरों को बेवकूफ बना रहे हैं। आखिर वे क्यों अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं करते हैं ? वे क्यों नहीं कहते हैं कि यदि मालिक केवल नियम कानून और लाभ की बात करेंगे और मजदूरों को हासिल सुविधाओं और अधिकारों को खत्म करेंगे तो मजदूरों को न्याय दिलाने के लिए शोषण और अत्याचार में लिप्त बागान प्रबंधकों पर वे भी कानूनी कार्रवाई करने के लिए तैयार हैं? मजदूर संघ के पदाधिकारी कभी भी मजदूरों के अधिकार को लेकर कोर्ट जाने की बात नहीं करते हैं। यही वह बिन्दु है जहाँ वे बेनकाब हो जाते हैं।