दें वोट शिक्षित उम्मीदवार को

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नेह अर्जुन इंदवार

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#Dooars_Terai लोकसभा चुनाव विशेष:-

दोस्तों यह ठीक है कि लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए कानून में शिक्षा अनिवार्य अहर्ता नहीं है। लेकिन कानून, राजनीति, रणनीति, विकास के सिद्धांत आदि तमाम विषय अत्यंत दुरूह और गंभीर (Complex and Serious)  विषय है।इसीलिए समाज और देश विकास के लिए उच्च शिक्षित, विद्वान, ईमानदार और विनम्र व्यक्ति को जनप्रतिनिधि बनाने की परंपरा रही है। एक दो अनपढ़ लोग भी प्रचंड लोकप्रियता के कारण सांसद या विधायक बनते रहे हैं। लेकिन वे दूसरे लोगों पर न सिर्फ आश्रित होकर काम करते रहे हैं, बल्कि चालाक, बेईमान, स्वार्थी लोगों के द्वारा ऐसे लीडरों का खूब दुरूपयोग और शोषण किया गया। डुवार्स तराई में ऐसे शोषित नेता अनेक हुए हैं। वे बाहरी लोगों के कब्जे में होते थे।
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भारतरत्न बी आर अम्बेदकर को हिन्दू जाति और वर्ण भेदभाव के नाम पर बचपन में क्लास के बाहर पढ़ने के लिए बैठाया जाता था। उसे खुद कुँए से पानी भरने और पीने नहीं दिया जाता था, बल्कि कोई ऊपर से पानी ऊँढेल देता तो वह अपनी प्यास बुझाता था।
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लेकिन अम्बेदकर ने बहुत पढ़ाई की और जिंदगी में 32 डिग्रियाँ हासिल कीं। वे 9 भाषाओं के जानकार थे। एक उच्च शिक्षित व्यक्ति नेता बन कर समाज में कितना परिवर्तन ला सकता है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण अम्बेदकर से बढ़कर और कोई नहीं हो सकता है।
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उन्होंने अपनी शिक्षा और योग्यता के बल पर देश के पिछड़े समाजों (दलित और आदिवासियों) की जिंदगी बदल दी है। देश में नारियों को अधिकार देने वाला हिंदू कोड बिल उन्हीं के बदौलत बना और महिलाओं को तलाक, संपत्ति और उतराधिकार का अधिकार मिला।  उन्हीं के बदौलत दलित और आदिवासियों को शिक्षा, नौकरियों और चुनाव में आरक्षण मिला।
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आज बीस करोड़ लोगों की जिंदगी शिक्षा, ऩौकरी और व्यापार के बल पर गरीबी की दलदल से निकल कर पूरी तरह बदल गई है तो उसका एकमात्र श्रेय अम्बेदकर को जाता है। जाति और वर्ण व्यवस्था को उन्होंने चुनौती दी और धार्मिक भेदभाव को खत्म करने का बीड़ा उठाया था।
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भारत में रिजर्व बैंक की स्थापना उनके अर्थ शास्त्र के प्रथम शोध के आधार पर हुई। उनके द्वितीय शोध के आधार पर देश में वित्त आयोग की स्थापना हुई। उन्होंने कृषि में सहकारी खेती के द्वारा पैदावर बढ़ाने, सतत विद्यूत और जल आपूर्ति करने का उपाय बताया। उन्होंने देश के नदियों को जोड़कर देश में जल प्रबंधन की बात सामने रखी। ऐसे करीब 200 से अधिक विकास की मूलभूत बातें उन्होंने देश के सामने रखी। संविधान बनाने की बात तो सभी जानते हैं।
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एक उच्च शिक्षित, चिंतन मनन करने वाला और अशिक्षित व्यक्ति में बहुत अंतर होता है। अशिक्षित व्यक्ति समाज को जोड़ने की जगह तोड़ता है और कमजोर करता है।
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डुवार्स तराई का चाय अंचल आज अत्यंत गंभीर सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक समस्याओं से ग्रसित है। उसे विकास के पथ पर अग्रेषित करना किसी अनपढ़ या अर्धशिक्षित लोगों के बस की बात नहीं है। हजारों तरह के विश्लेषण, चिंतन, मनन सिर्फ उच्च शिक्षित लोग ही कर सकते हैं।
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यदि आप अपना जन प्रतिनिधि किसी अशिक्षित या अर्धशिक्षित को चुनेंगे तो आप निश्चय ही अपनी और अपने बच्चों की भविष्य को अंधकार के गर्त में धकेलेंगे।
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लोकतंत्र में चुनाव सबसे बेहतर प्रतिनिधि को चुनने का मौका देता है। भावनाओं में राजनैतिक पार्टियों की गुलामी और धांगराई करके वोट देने से कुछ हासिल नहीं होता है। क्या आप किसी पार्टी के गुलाम और नौकर हैं कि आप अपनी भलाई की बात पर नहीं, बल्कि मीडिया के द्वारे फैलाए गए दूर की बातों के आधार पर देंगे? आपकी रोटी, रोजी , आवास, आपके बच्चों की शिक्षा और उन्नति की बातों को भुला कर आप चुनाव में कई लाख कमाने के लिए निकले व्यक्ति की बातों के आधार पर वोट देंगे?
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अब चाय अंचल के चुनाव में उच्च शिक्षित उम्मीदवार आने लगे हैं। पहले राजनैतिक पार्टियाँ अनपढ़ों को जानबूझ कर चुनाव में उतारती थी ताकि वे उस जनप्रतिनिधि को मिले विशेषाधिकारों को अपने हाथों में लेकर उसका लाभ अपने स्वार्थ के लिए उठाएँ और जनता के नुकसान पहुँचाएँ। ख्याल रखें जलपाईगुड़ी, दार्जिलिंग, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता में कभी भी किसी अर्धशिक्षित को चुनाव में उम्मीदवार नहीं बनाया जाता है। आपको अनपढ़, गरीब और बेवकूफ समझ कर आपको अर्धशिक्षित उम्मीदवार दिया गया है।
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आज तक राजनैतिक पार्टियों के जन प्रतिनिधियों ने चाय मजदूरों के लिए कुछ नहीं किया है और वे आगे भी नहीं करने वाले हैं। सभी राजनीति पार्टियों के वास्तविक मालिक उच्च आय वर्ग के बड़े-बड़े लोग हैं जो दिल्ली और कोलकाता में रहते हैं। वे चाय बागानों के मालिकों के दोस्त हैं न कि चाय मजदूरों के। ये नेता लखपति, करोड़पति और अरबपति हैं। वे आपको खाना खिलाकर, कुछ पैसे देकर या दलालों को लगाकर आपका वोट ले लेंगे और वोट लेने के बाद आपके चुने गए प्रतिनिधियों को अपने कब्जे में रखेंगे और उन्हें कोई काम करने नहीं देंगे। आज तक कोई नेता कुछ भी कल्याण का काम नहीं किए हैं क्योंकि उनके दिल्ली और कोलकाता के मालिक उन्हें काम करने नहीं देते हैं।
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न्यूनतम मजदूरी, बागान घर का पट्टा, बच्चों के लिए रोजगार संबंधी प्रशिक्षण, अंग्रेजी स्कूल आदि मजदूरों को अब तक क्यों नहीं मिला है? ये मत सोचिए कि इसे सिर्फ राज्य के सत्तारूढ पार्टी ने नहीं दिया है। बल्कि केन्द्र सरकार के पास राज्य से भी अधिक ताकत और संसाधन होता है उसने भीजानबुझ कर कुछ नहीं दिया है और आगे भी नहीं देने वाला है। यदि ये पार्टियाँ ईमानदार होंती तो वे उच्च शिक्षित ऐसे युवाओं को उम्मीदवार बनाते जो अपनी शिक्षा, ज्ञान, योग्यता और विशेषाधिकार के बल कर जनता की समस्याओं को सुलझाने के लिए जी-जीन लगा देते। लेकिन इनकी चालाकी देखिए ये दलबदलु, पैसे के पीछे भागने वाले, किसी से कोई मतलब नहीं रखने वाले बेईमान और अर्धशिक्षितों को चुनाव में खड़े किए हैं ताकि वे चाय मजदूरों का कोई भला न कर सकें।
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एक उच्च शिक्षित ईमानदार नेता जीवन में क्या-क्या कर सकता है, इसका सबसे बड़ा उदाहरण भारत रत्न अम्बेदकर है। अब आप निर्णय कीजिए कि आप को कैसे नेता की जरूरत है ?