क्यों होता है किसी व्यक्ति का शोषण ?

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किसी व्यक्ति का शोषण क्यों होता है ? या कहें किसी समाज, वर्ग या क्षेत्र का शोषण क्यों होता है? व्यक्ति जब दिमागी और शारीरिक रूप से पंगु होता है तो दिमागी और शारीरिक रूप से सक्षम व्यक्ति कमजोर व्यक्ति का शोषण करता है।
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डुवार्स तराई या पश्चिम बंगाल के चाय अंचल में कार्य कर रहे चाय मजदूरों का भी शोषण का मुख्य कारण मजदूरों की दिमागी और शारीरिक कमजोरी है। उनके शिक्षित बच्चों की दिमागी कमजोरी भी उनके शोषण के बनाए रखने में अपनी भूमिका निभाता है।
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चाय मजदूर शोषण के स्तर, प्रकार, मेकानिज्म को नहीं जानता है। यदि कुछ समझता भी है तो वह शारीरिक कमजोरी अर्थात् आर्थिक और सामाजिक कमजोरी के कारण उसका प्रतिकार करने में असमर्थ है। मजदूरोे के शिक्षित बच्चों से भी उन्हें कोई मदद नहीं मिलती है। क्योंकि वे न तो राजनीति को जानते हैं और न उसे समझते हैं। बल्कि उसी शोषण तंत्र में खुद को खपा कर अपने समाज के लिए नई बेड़ियाँ तैयार करते हैं।
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तब उसका शोषण कैसे बंद होगा? एक उपाय है, और वह है शोषणकर्ता का ह्रदय परिवर्तन किया जाए। इसके लिए धार्मिक कृत्य किए जाएँ, प्रार्थना किया जाए, हवन दिया जाए। लेकिन क्या आज तक दुनिया में कहीं किसी शोषणकर्ता का ह्दय परिवर्तन किसी प्रार्थना से हुआ है? यदि एक या दो शोषणकर्ता हो तो प्रार्थना से कोई चमत्कार होने की एक प्रतिशत गुंजाईश भी हो सकती है। लेकिन जहाँ शोषण का रूप आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, भाषाई, नियम, कानून, सत्ता, सम्प्रदाय, साम्रज्यवादी-सामंतवादी मानसिकता आदि हो वहाँ किसी प्रार्थना या एकल प्रयास से कोई परिवर्तन होने की कोई गुंजाईश नहीं होती है।
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तमाम तरह के शोषण उत्पिड़न, अत्याचार, ठगी से निजात पाने के लिए एक बेहद सोची समझी रणनीति, रोडमैप बनाने की जरूरत होती है। प्रथम चरण की रणनीति को न तो अंतिम चरण में लगाया जा सकता है और न ही अंतिम चरण की रणनीति को प्रथम चरम में लागू किया जा सकता है। लेकिन चाय मजदूरों या स्थानीय समाज के लिए काम करने का दावा करने वाले सामाजिक संस्थाएँ यथा आदिवासी विकास परिषद और नेपाली या गोर्खा पार्टियाँ कभी भी आर्थिक पक्ष के स्वावलंबन के लिए न तो कोई रोडमैप तैयार कर पाए हैं और न ही कोई फूलप्रुफ रणनीति बना पाए हैं। उनकी रणनीति इतनी कमजोर हैं कि वे आपस में ही सिर फुट्टवल्ल करते हैं और आपस में ही थोड़े से पैसों और प्रभाव के लिए एक दूसरे को मारने-काटने के लिए तैयार रहते हैं।
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क्या दिल्ली, कोलकाता के सामंतों, साम्रज्यवादी लोगों के हाथों में सिमटी केन्द्रीकृत वर्तमान राजनैतिक ढाँचे या चुनावी राजनीति से चाय बागानों की समस्या सुलझेगी? राजनैतिक पार्टियों के द्वारा चाय बागान में रहने वाले लोगों की सामाजिक कायापलट की बात सोचने वाले या तो राजनीति और उससे जुड़ी अवैध कमाई की बात नहीं जानते हैं या राजनीति के विद्यार्थी नहीं हैं और राजनीति के मजनून के बीच की भाषा पढ़ने में असमर्थ हैं।
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राजनीति पार्टियाँ चंदे के बल पर चलती हैं। राजनीति में लोग पैसे बनाने के लिए आते हैं। किसी भी राजनीति में दो चार लोगों को छोड़कर शायद ही कोई ईमानदार और नेक नियत दिल का आदमी होगा। चाय अंचल में राजनीति पार्टियों का पैसा आता कहाँ से है ? क्या चाय मजदूरों के चंदे राजनैतिक पार्टियाँ ले सकती हैं? कानूनन मजदूर संघों को मजदूरों से लिए पैसे को संघ के बैक खाते में रखा जाना चाहिए और उसका उपयोग संघ के सार्वजनिक और मजदूर हितों के लिए किया जाना चाहिए।
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लेकिन क्या मजदूरों को पता है कि उससे उघाए गए करोड़ों रूपये का प्रबंधन कैसे होता है और कौन करता है? चाय मजदूर संघ में चाय अंचल के ऐसे लोग क्यों आते हैं जिनका कोई सगा संबंधी चाय बागानों में काम नहीं करता है? मजदूर संघों में बाहरी लोगों का मुख्य आकर्षण चाय मजदूरों से मिलने वाला सौ करोड़ के चंदा ही है। इस चंदे के बारे कभी न तो कोई मजदूर पूछता है और न कोई नेता इसका कोई हिसाब किताब दिखाता है? मजदूरों के शोषण के लिए चाय मैनेजर तरह-तरह के उपाय ढूँढते हैं और उसे सफल बनाने के लिए कुछ घुस मजदूर नेताओं को मिलता रहता है। जिस मजदूर संघ को मजदूर अपना माई-बाप समझता है वह तो उसके खून चूसने का एक औजार बना हुआ है, इसे अधिकतर मजदूर नहीं जानते ही नहीं हैं।
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मजदूर संघों का नियंत्रण राजनैतिक पार्टियों से जुड़े नेता करते हैं। इन नेताओं को मजदूरों के सर्वहिताय कल्याणकारी लक्ष्यों से कोई लेना देना नहीं होता है। वे तो अपनी पार्टी का प्रभाव बढ़ा कर अपना व्यक्तिगत प्रभाव क्षेत्र का विस्तारण करता है और उस प्रभाव से विभिन्न तरह से कमाई का रास्ता निकालता है।
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चाय मजदूरों को भारत में सबसे कम मजदूरी क्यों मिलती है? इसे जानने के लिए चाय मजदूरों के बेटे-बेटियाँ फिक्रमंद नहीं हैं। यदि वे फिक्रमंद होते तो चुनाव के वक्त किसी एक पार्टी का पूर्जा नहीं बनते। यदि वे फिक्रमंद होते तो दो तीन सौ रूपये के लिए किसी पार्टी के लिए काम नहीं करते और न ही अपने माँ-बाप के पेट पर जोर का लात मारते। वे सिर्फ कुछ पैसों की खातिर अपने माँ-बाप, भाई-बहन, चाचा-चाची, मामा-मामी के उपर हो रहे शोषण को मजबूत करने के लिए दिन-रात लगे हुए हैं और चाय बागानों में राजनैतिक-मजदूर संघ और बागान मालिकों का बना हुए एक शोषणतंत्र को मजबूत करके अपने भविष्य और पैरों पर कुल्हड़ी मार रहे हैं। वे चाहें शिक्षित हों या अर्धशिक्षित भयानक रूप से पिछड़ी मानसिकता से ग्रसित हैं।
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अब तक तृणमूल नेत्री दर्जनों बार डुवार्स तराई में बैठक और रैली कर चुकी है। लेकिन एक बार भूल से भी चाय मजदूरों के सम्मानपूर्ण मजदूरी के लिए कुछ नहीं कहा है। वह कुछ बोलेगी भी नहीं। इसी तरह बीजेपी के नेता की दो बड़ी रैली उत्तर बंगाल में हुई, लेकिन दोनों बार ही उन्होंने चाय मजदूरों के लिए दो तीन वाक्य से अधिक कुछ नहीं कहा। वह भी कुछ नहीं बोलेगा। वे दोनों इस क्षेत्र से नहीं है। बस इस क्षेत्र से उनकी पार्टी को वोट मिल जाए तो उनकी पार्टी मजबूत होगा। उनकी चिंता या लक्ष्य इतना ही है। उनकी चिंता का मुख्य लक्ष्य चाय बागान मालिकों से मिलने वाले 5000 करोड़ के चंदे होता है। यह चंदा ही है जो राजनैतिक पार्टियों को मजदूर के पक्ष में कुछ करने नहीं देता है। यही कारण है कि दिल्ली और कोलकाता के राजनीतिज्ञ संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार का प्रयोग चाय मजदूरों के बेहतरी के लिए नहीं करते हैं। वे न तो न्यायपूर्ण मजदूरी देने के लिए तैयार हैं और न घर का पट्टा। जबकि मजदूरी किसी पार्टी या नेता के पॉकेट से देना नहीं होता है।
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यदि चाय बागान में पार्टी के लिए जान लड़ा रहे युवाओं को लगता है कि वे देश को बदलने की राजनीति के लिए घाघ और बेईमान पार्टियों के लिए काम कर रहे है तो उनकी सोच पर तरस आना चाहिए। जो अपने रोटी, कपड़ा मकान, दुकान, रोजगार, विकास की बात खुद न करके दूसरों के भरोसे रहता है वह कभी न अपने अधिकारों को प्राप्त कर सकता है और न कभी उनकी शोषण की कहानी खत्म होगी।

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