चाय बागान में लूट-ठगी की एक संक्षिप्त विवरण-

नेह अर्जुन इंदवार 

पश्चिम बंगाल में 2015-16 में देश की 26 प्रतिशत चाय उत्पादन हुआ था। कुल 33 करोड़ किलोग्राम चाय का उत्पादन पश्चिम बंगाल के चाय बागानों में हुआ था। पश्चिम बंगाल में ब्लैक, ग्रीन, व्हाईट, उलूंग चाय की किस्में उपजायी जाती है। व्हाईट टी भारतीय बाजारों में 11 हजार रूपये प्रति किलोग्राम बिकती है, जबकि सबसे निम्न प्रकार की चाय भी ऑक्शन सेंटर में 153 रूपये किलोग्राम से कम में नहीं बेची गई है। यह टी बोर्ड की रिपोर्ट में लिखित हैं। 
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यदि समस्त चाय को हम 180 रूपये के औसत कीमत पर बेची गई मान लें तो पश्चिम बंगाल में कुल 330000000X180=59,40,00,00,000 (59 अरब 40 करोड़) रूपये की कमाई हुई। 
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उक्त साल में मजदूरों को 97 रूपये औसत मजदूरी मिली। मजदूरों ने 33 करोड़ चाय बनाने के लिए इसके 4.5 गुणा हरी पत्ती तोड़े। याद रखें 4.5 केजी चाय से एक केजी ब्लैक टी बनता है। मतलब 33X 4.5= 148.5 (1 अरब 48 करोड़ 5 लाख) हरी पत्ती तोड़े। यदि इसे 24 किलोग्राम प्रति मजदूर के हिसाब से भाग दें तो यह कुल 61875000 (6 करोड़ 18 लाख 75 हजार) लोगों ने मिलकर तोड़ा।
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प्रति महीने 26 दिन के हिसाब से पूरे वर्ष में 312 दिन काम के होते हैं। इसका मतलब है उस वर्ष 198317 मजदूरों ने काम करके 33 करोड़ चाय का उत्पादन किया। मतलब 198317 मजदूरों ने कुल 59 अरब 40 करोड़ कमाने में मदद किए। यह प्रति मजदूर ने पूरे साल में 299520.46 (2 लाख 99 हजार 520 रूपये 46 पैसे कमाई किया। लेकिन उसे मिला कितना ? प्रत्येक मजदूर को साल में तीन लाख कमाई करके भी महज 30264/- रूपये मिला। करीबन तीन लाख में से उसके 269256/- (दो लाख 69 हजार 256 रूपये) बागान की कंपनी की कमाई बन गई। इसमें से कुछ टैक्स में गया कुछ अन्य व्यय में। लेकिन वह किसी भी तरह पाँच प्रतिशत से अधिक नहीं था। 
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री गरीब घर से संघर्ष करके मुख्यमंत्री की कुर्सी तक आई है। वह कहती है लालपार्टी के जमाने में चाय मजदूरों को तीन-चार रूपये बढ़ा कर दिया जाता था। हमारी सरकार ने 67 रूपये से बढ़ा कर 176 रूपये कर दिया। सवाल उठता है कि एक गरीब घर से निकली मैम साहब को क्या मजदूरों के साथ होने वाले गंभीर शोषण की बातें नहीं मालूम ? क्या उनकी पार्टी, मजदूर संघ, श्रम मंत्रालय इस तरह के कैलकुलेश नहीं मालूम। 
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तीन लाख कमा कर मालिक को देने वाले मजदूर को 350 रूपये की मजदूरी मिलती तो उसे पूरे महीने काम करने पर 9100 रूपये मिलते और साल में पूरे काम करने पर 109200 (1 लाख 9 हजार 200 रूपये) मिलते। इतना हाजिरी मिलने के बाद भी मालिक को एक मजदूर से 160056 (एक लाख 60 हजार 56 रूपये) की कमाई होती मतलब इससे बहुत अधिक कमाई हुई है।
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चाय मजदूर 2014 से न्यूनतम वेतन अधिनियम के अधीन न्यायपूर्ण मजदूरी मांग रहा है। लेकिन विभिन्न बहाने बना कर उन्हें वंचित किया जा रहा है। उपरोक्त कैलकुलेशन के आधार पर सोचिए क्या बनाए जा रहे तमाम बहाने का कोई आधार है? टी बोर्ड चाय की गुणवत्ता के बनाए रखने के लिए बहुत कोशिश कर रहा है। भविष्य में गुणवत्तापूर्ण चाय के उत्पादन से चाय की कीमत अधिक मिलेगी। मुनाफा भी बढ़ेगा। लेकिन मजदूरों को वंचित क्यों किया जा रहा है? 
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चाय बागानों में मजदूरों को जानबुझ कर गरीब रखा जाता है ताकि पूरा समाज शिक्षित न हो जाएँ और चाय बागानों के लिए बिल्कुल भीख देने के पैसे में सस्ती मजदूर मिलना बंद न हो जाए। बागान मालिकों की इस मंशा से सरकार भी सहमत है। फिर आदिवासी और नेपाली मजदूर तो गैर बंगाली हैं, उनके शोषण से राज्य को कई प्रकार से लाभ ही मिलेगा। 
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दोस्तों मैंने भी चाय बागान में जिंदगी जीया है। मुझे एक चाय मजदूर के गरीबी और मजबूरी की बहुत गहराई से एहसास है। मेरा कर्तव्य बनता है कि है कि चाय मजदूरों के शोषणकर्ताओं के बारे मैं पूरी बात चाय मजदूरों के शिक्षित बच्चों को बताऊँ। शोषण, पक्षपात, अत्याचार, अन्याय का विरोध करना हर व्यक्ति का परम कर्तव्य है। आपकी का भी कर्तव्य है कि आप अपने माँ-बाप, परिवार और पूरे समाज पर हो रहे शोषण का विरोध करें। पार्टी के कल्याण और लाभ के लिए आप अपने समाज और कल्याण की बात को 200-500 रूपये में न बेचें। पार्टी की दलाली न करें न दलालों को प्राश्रय दें। 
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लोकतंत्र में वोट की शक्ति से शासक बदलते हैं। जो शासक कई अरब रूपये का शोषण करे और भीख में पाँच दस करोड़ रूपये थमा दे और उसे भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दे या एक परब के नाम पर एक छुट्टी की घोषणा कर दे, क्या उसे ही आप पूज्यनीय मानते हैं। हिंदी कालेज में 6 प्रतिशत आरक्षण मिलता है। समाज को 100 प्रतिशत आरक्षण क्यों नहीं मिला, जबकि पैसा आदिवासी के नाम पर लगा है। आज आदिवासी मंत्रालय से आदिवासियों को क्या लाभ पहुँच रहा है? 
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दोस्तों यदि राज्य में वास्तविक परिवर्तन की सरकार होती. सबकी उन्नयन की बात सरकार सोचती तो राज्य सरकार ने 12 दिसंबर 2016 में Bought Leaf Factories के लिए जैसे बिना मांगे ही न्यूनतम मजदूरी के लिए Notification जारी किया था, वैसे ही वह चाय बागानों में सौ वर्ष से शोषण का शिकार होते मजदूरों के लिए भी निकालती। लेकिन इस सरकार ने नहीं निकाला। क्यों नहीं निकाला ? क्या दोष था चाय मजदूरों की ? आखिर कौन मजदूरों के साथ ठगी कर रहा है? चाय अंचल में इस ठगी पर कौन बाहरी शोषकों को साथ दे रहा है ? आज वोट मांगने वाले ने मजदूरों को न्याय दिलाने के लिए क्या-क्या कदम उठाया ? वे मामले को लेकर कोर्ट क्यों नहीं गए ? आखिर वे किनके लिए काम करते हैं? 
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दोस्तों उपर दिए गए कैलकुलेशन बहुत महत्वपूर्ण है। उसे अपने मोबाईल में save करें या स्वयं को email करें और उसे सुरक्षित रख लें। यह शोषण से आपके समाज की मुक्ति के लिए बहुत काम का कैलकुलेशन है। वोट मांगने के लिए आने वाले लोगों से इस बारे पूछिए कि वे किसी अन्य की बात न करके सिर्फ यह बताएँ कि चाय मजदूरों के साथ सरकारी पक्ष द्वारा क्यों लगातार ठगी की जा रही है?