“आदिवासी” शब्द को विवादास्पद बनाने की एक नयी मुहिम

नेह इंदवार

आदिवासियों की रूढ़ हो चुकी पहचान “आदिवासी” शब्द को विवादास्पद बनाने की एक नयी मुहिम शुरू हुई है। मूल रूप से गैर आदिवासियों और विशेष कर आरएसएस जैसी संस्थाओं द्वारा यह शुरू की गई है। आरएसएस का नाम सीधे-सीधे लेने का मुख्य कारण उनके द्वारा स्थापित वनवासी कल्याण केन्द्र है, जो आदिवासियों और देशवासियों के दिमाग में वनवासी शब्द को ठूँसने के लिए अब तक अरबों रूपये खर्च कर बैठा है। उनके द्वारा पहले सोचा गया होगा कि आदिवासी तो अशिक्षित हैं, सदियों से बेनाम हैं। इसलिए उन्हें कोई भी नाम दे दिया जाए वे उसे स्वीकार कर लेंगे। फिलहाल वे आदिवासी शब्द को अपने परिचय के लिए स्वीकार करके अपने मूलदेश (भारतीय उपमहादेश) में अपने अधिकार की बातें कर रहे हैं। इसलिए उन्हें आदिवासी शब्द से किसी भी तरह दूर किया जाए और कोई दूसरा नाम दे दिया जाए।
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इसी चिंतन धारा में रहते हुए बनवासी या वनवासी नाम को आदिवासियों के बीच फेंका गया। लेकिन शिक्षित हो रहे आदिवासियों ने इसे अपमानजनक शब्द कहते हुए सिरे से ही नकार दिया है । लेकिन वनवासी नाम को आदिवासियों के बीच प्रचलित करने के लिए और उसके दिमाग में डालने के लिए खरबों रुपया तक खर्च कर दिए गए। सैकड़ों आदिवासियों के माईंडवाश करने के खेल के तहत उन्हें पैसा और पद दिए गए। आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, भाषाई, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक स्पर्धा, संघर्ष, लड़ाई और रणनीति से अन्जान लोग उनके फेरे में पड़ गए और वे अपने को वनवासी कहने लगे। दूसरों को भी वनवासी शब्द को अपनाने के लिए प्ररित करने लगे। कई राज्यों में आदिवासी समुदाय अपनी समुदाय और गोत्र के नाम की जगह अपने नाम के साथ “राम” “ओराम” जोड़ने लगे।
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आदिवासी शब्द के उच्चारण मात्रा से ही बोध होता है कि आदिवासी भारतीय उपमहादेश के मूल निवासी हैं। इसलिए आदिवासियों को आदिवासी शब्द से दूर करने के लिए बहुत कोशिशें की जा रही थी। हिंदी में आदिवासी शब्द का साधारण अर्थ है वह समुदाय जो आदिकाल से इस धरा का मूलनिवासी है। आस्ट्रेलिया में 65 हजार वर्ष पुरानी मानव बस्ती के चिह्न पाए गए हैं। https://www.nytimes.com/…/humans-reached-australia-aborigin… वैज्ञानिक खोजों के अनुसार मानवों का मूल पूर्वज अफ्रिका के अपने मूल स्थान से ही दुनिया में छितराए। यदि अफ्रिका से मानव आस्ट्रेलिया गए होंगे तो वे एशिया के रास्ते से ही गए होंगे। एक लाख पूर्व विश्व के महादेश आज जितने दूर नहीं थे। भारतीय महादेश में भी तब से ही इंसानों ने बसना शुरू किया था। राखीगढ़ी में मिले 4500 वर्ष पुराने कंकाल के अध्ययन में वैज्ञानिकों को आर्य जीन नहीं मिला। उस जीन में भारतीय आदिवासियों के जीन के लक्षण मिले हैं। अर्थात् आदिवासी समुदाय आर्यों के आने के 40-50 हजार वर्ष पहले से भारतीय उपमहाद्विप में रह रहे हैं और उन्हें आदिवासी कहना सर्वथा उचित है। आज भारत में रहने वाले आदिवासी या गैर आदिवासी सभी भारतीय हैं। लेकिन आदिवासी अपने मूलनिवासी होने के इतिहास से भावनात्मक जुड़े रहना चाहते हैं और इस स्थिति से उन्हें पदच्यूत करने के लिए कुछ लोग षड़यंत्रों में रत हो रहे हैं।
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जब आदिवासी अनपढ़ थे, दूर दराज के क्षेत्रों में रहते थे तो उन्हें किसी परिचय के शब्द की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन जब वे शिक्षित हुए और एक परिचय के शब्द की जरूरत हुई तो उन्होंने सटीक ढंग से आदिवासी शब्द को चुन लिया है। शब्द चुनने में उनसे कोई गलती नहीं हुई। आदिवासी शब्द से मिलता जुलता शब्द भी हैं, लेकिन आदिवासी कहने से ही एक क्षण में भारत के मूलनिवासी समुदाय का भान होता है।
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पाँचवी अनुसूची, पाँचवी अनुसूची में आदिवासी अधिकार, आदिवासी दिवस आदि कुछ ऐसे नाम-मुद्दे हैं जो आदिवासियों को दूसरे नव-आंगतुकों से अधिक प्राकृतिक अधिकार देता है। आरक्षण का विरोध करने वालों के लिए देश में आदिवासियों का विशेष अधिकार भी आंख की किरकिरी बनी हुई है। इसी क्रम में वे आदिवासियों को आदिवासी शब्द से दूर करने के लिए षड़यंत्र करने में लग गए हैं। इस क्रम में वे आदिवासी शब्द को ही घटिया, असभ्यता, अशिक्षित, कमजोर आदि का पर्याय (शब्द) साबित करने की कुचेष्टा में लग गए हैं।
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यह तो गनीमत रही है कि आजाद देश में आदिवासियों को पढ़ने लिखने की सुविधा प्राप्त हुई और वे अपने बारे में सोचने लगे और दूसरों की कुदृष्टि, कुचेष्टा और षड़यंत्र को समझने लगे हैं। आदिवासियों ने अपना असली परिचय नियत कर लिए हैं। वे अपने को आदिवासी अर्थात् इस देश के सबसे पुराने, मूलवासी घोषित कर लिए हैं और इसका पुरातात्विक सबूत भी सामने आ रहे हैं। अब आदिवासी दूसरों के द्वारा फेंके गए शब्दों से अपना परिचय नहीं गढ़ रहा है। अब उन्हें पता चल गया है कि वह इस धरा का मूल निवासी है और इस मूल निवासी को इंगित करने के लिए हिंदी का आदिवासी शब्द सबसे उचित और सटीक शब्द है। आदिवासी शब्द का वरण कर लेने के कारण आज भारत के सबसे प्राचीन समुदाय आदिवासी के नाम पर अपनी पहचान कायम कर लिया है।

प्राचीन समुदाय ने वनवासी शब्द को पूरी तरह खारिज कर दिया है। खरबों रुपए खर्च करने वालों के लिए यह एक बड़ी हार थी। लेकिन वे अपनी बेइज्जत भरी हार को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं।

पिछले 1 साल से वनवासी शब्द को रोकने की कवायद एकदम कम हो गई है। आप वनवासी शब्द बड़े शहरों के सेठों को बेवकूफ बनाकर उनसे पैसा झटकने का शब्द रह गया है। हाल ही में वनवासी शब्द को सामने रखकर कई बड़े शहरों में हिन्दू अरबपतियों से कई करोड़ रुपए झटक लिए गए हैं। उनसे कहा गया कि वे वनवासियों को हिन्दू बनाने और उन्हें वनवासी परिचय से आबद्ध कर देने के लिए इन पैसों का उपयोग करेंगे। वनवासी शब्द से मिली बेइज्जतपूर्ण हार से तिलमिलाए लोगों ने अब आदिवासी शब्द की जगह अनुसूचित जनजाति शब्द को थोपने के लिए कवायद शुरू कर दिए हैं।

लेकिन अनुसूचित जनजाति शब्द का उत्पादन और उम्र दोनों ही बहुत कम है। आदिवासी शब्द की मांग को संविधान सभा में नहीं माना गया। तब आदिवासियों में इने गिने शिक्षित थे और जातिवादी-वर्णवादी विचारों से संचालित देश में उनके अधिकारों का सम्मान करने के लिए या कराने के लिए कोई महौल उपलब्ध नहीं था। लेकिन विचारणीय बात तो यह है कि यह शब्द सिर्फ उनके लिए प्रयोग में होता है जिन्हें आरक्षण मिलता है। कई समुदायों को आरक्षण से निकाल दिया गया है और कई को हाल फिलहाल आरक्षण दिया गया है। तो क्या जिस दिन किसी का अनुसूचित जनजाति का आरक्षण खत्म हो जाएगा, उस दिन उसका समुदाय का नाम भी बदल जाएगा ? जब किसी समुदाय को आरक्षण दिया जाएगा, क्या उस दिन से वे अपने पुराने नाम को त्याग देंगे और अनुसूचित जनजाति नाम धारण कर लेंगे ? जब आरक्षण खत्म हो जाएगा तो इस शब्द की क्या अहमियत होगी ? अनुसूचित जनजाति शब्द को आदिवासी शब्द के साथ जुड़े मूलनिवासी के भावनाओं का लोप करने और प्रथम निवासी होने के दावों को भोथरा और विलुप्त करने के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है। अनुसूचित शब्द आदिवासियों के असली पहचान को खत्म कर देगा। पुनः जिस दिन आरक्षण खत्म हो जाएगा, उस दिन समुदाय का अस्तित्व और नाम भी खत्म हो जाएगा। मतलब वह पूँछ कटा बंदर बन जाएगा। तब वे ना घर के रहेंगे ना घाट के। ना तो उनका इतिहास बचेगा और न दावा और न अधिकार।

जब आदिवासी समाज अनुसूचित जनजाति शब्द को भी ठुकरा दे रहा है, तो षड़यंत्र के रंग-रूप को बदल दिया जा रहा है। नये पैंतरे के साथ नयी चाल चली जा रही है। संताल, उरांव मुंडा, गोंडी भील शब्द तो अलग-अलग समुदाय का नाम है। इन शब्दों से इनके प्राचीन काल के मूल निवासी होने का कोई स्थायी पहचान नहीं झलकता है। यह ब्राह्मण, जाट, ठाकुर आदि की तरह जाति और समुदाय की पहचान बताने वाले शब्द हैं। इन शब्दों से किसी समुदाय का प्राचीन या आवार्चीन होने का कोई पता नहीं चलता है। लेकिन आदिवासी शब्द पहचान, इतिहास और अधिकार का परिचय देता है। सबसे बड़ी हैरानी की बात यह है कि भारत में करीबन 3000 से अधिक समुदाय और जाति है, लेकिन कोई किसी ब्राह्मण, वैश्य, ठाकुर का नाम बदलने की चेष्टा नहीं कर रहा है। उनकी दिलचस्पी सिर्फ आदिवासियों के नाम को बदलने में है। आखिर आदिवासियों के साथ उनकी क्या जाती दुश्मनी या दोस्ती है ? जिन्हें सभ्यातों, संस्कृतियों, भाषाओं के संघर्ष के इतिहास और साहित्य के बारे मालूम नहीं है, उनके लिए यह मसला बहुत साधारण विषय लगता है, लेकिन यह साधारण विषय या मुद्दा नहीं है।
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बहुत हैरानी होती है जब शहरों में रहने वाले आदिवासी भी आदिवासी शब्द को बदलने या कहें आदिवासी शब्द से छुटकारा पाने के लिए छटपटाते देखे जाते हैं। वास्तविक बात क्या है ? या तो वे आरक्षण पाने वाले नकली आदिवासी हैं या जिनकी माँ गैर आदिवासी हैं या जिनकी कार्य और ज्ञान अक्षमता के लिए आदिवासी कह कर उन्हें अपमानित किया जाता है और वे आदिवासी शब्द से छुटकारा पाने के रास्ते तलाशते हैं या फिर वे आदिवासी शब्द के लिए दिए जा रहे नकरात्मक अर्थ और परिभाषा को ही असली अर्थ और परिभाषा समझ लिए हैं और दूसरों के द्वारा किए जा रहे हमलों से बचने में असमर्थ हैं। व्यक्तिगत समस्या को सामाजिक और राजनैतिक समस्या बनाना बहुत गलत है।

आदिवासी शब्द से चिढ़ने वाले जानते हैं कि आदिवासी शब्द के लुप्त हो जाने पर आदिवासियों का प्राचीनता और प्राचीन समुदाय होने के दावे और इतिहास भी धीरे धीरे जनमानस और साहित्य से लुप्त हो जाएगा। गैर आदिवासी तो चाहते हैं कि आदिवासी “आदिवासी'” शब्द को अपनी पहचान बताना बंद करें। इनसे उन्हें बहुत कोफ्त होती है। वे अपने आपको बाहरी मानने के लिए विवश हो जाते हैं। आदिवासी शब्द आदिवासी समुदाय को इस भारतीय धरा पर उपस्थित सभी तरह के संसाधनों में अपना प्रथम हक और दावा करने का अधिकार देता है। सामुदायिक नाम (संताल, मुंडा, कोल, भील, गोंड, उराँव, पहाडिया आदि) तो अपने साथ रहेगा ही लेकिन यह प्राचीनतम समुदाय होने के दावे को ज्यादा पुख्ता नहीं कर पाएगा। क्योंकि समुदाय के नाम के साथ संस्कृति, भाषा, क्षेत्र आदि तो जुड़ा हुआ है, लेकिन प्राचीनता का बोधमय भावना जुड़ी हुई नहीं है। हर नयी पीढ़ी का सामान्य ज्ञान और सामान्य जानकारी उपलब्ध साहित्य और सूचनाओं के आधार पर बनता है। भविष्य की पीढ़ियों के लिए आदिवासी शब्द अन्जाना नाम होगा तो वे उस शब्द से भावनात्मक रूप से न तो अपने को जोड़ पाएँगे और न ही अपनी अस्तित्व को। आदिवासी अभी तक मीडिया साहित्य और रिकॉर्ड रखने के मामले में फिसड्डी साबित हुआ है। दूसरे लोग कालांतर में ऐसी साहित्य और रिकार्ड बना लेंगे, जहाँ आदिवासी शब्द ढूँढने में भी नहीं मिलेगा। जैसे हम आज अपनी भाषाओं से दूर हो जा रहे हैं वैसे ही अपने परिचय के शब्द से भी दूर हो जाएँगे और एक दिन उसे हम अनावश्यक मान लेंगे और अपने आप को तथाकथित मुख्य धारा में कहीं गुम कर लेंगे। जब आदिवासी शब्द के साथ जुड़े इतिहास, जानकारी, संस्कृति आदि ही नहीं रहेंगे तो आने वाली आदिवासी पीढ़ियों को उसके बारे में कुछ भी पता नहीं चलेगा। कल आने वाली पीढ़ी अपने हक अधिकार और उत्तदायित्व की बात भी नहीं कर पाएगा।
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मूल बात यही है कि आदिवासी शब्द का कोई विकल्प नहीं है। Native Indian या Indigenous शब्द को अपनाने की सलाह भी धोखात्म और कपटपूर्ण है। मुद्दई किसी भी तरह से समाज को आदिवासी शब्द से दूर लेकर कहीं अंधेरे में धकेल देने की कामना में रत हैं।
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आदिवासी शब्द को हटाने के चाहने वालों की मनोकामना कभी पूरी नहीं होगी क्योंकि आज आदिवासी शिक्षित हो गया है और अपने अधिकारों, इतिहास, आत्म सम्मान के प्रति जागरूक भी।

आदिवासी समाज को दौरे से क्या मिलने वाली है ?

           नेह इंदवार

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी  दिनांक 29 अक्तूबर 2018 से तीन दिन की उत्तर बंगाल दौरे पर हैं। खबरों के अनुसार इस दौरे में ममता दीदी डुवार्स भी जाएँगी, वहाँ रूकेगीं, एक जनसभा को भी संबोधित करेंगी और नवंबर के प्रथम दिन को सिलीगुड़ी स्थित उत्तर बंगाल सचिवालय सुकन्य में पश्चिम बंगाल ट्रइब्स एडवायजरी कौंसिल (टीएसी) की बैठक की अध्यक्षता भी करेंगी।
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देश में लोकसभा के लिए आम चुनाव होने वाले हैं। उत्तर बंगाल के अलिपुरद्वार, कोचबिहार, जलपाईगुड़ी और दार्जिलिंग लोकसभा चुनाव क्षेत्र में आदिवासियों की जनसंख्या चुनाव को पूरी तरह प्रभावित करने वाली संख्याबल मौजूद है। सवाल है कि चाय बागानों और इत्तर क्षेत्र में रहने वाला आदिवासी समाज को इस दौरे से क्या मिलने वाली है?
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क्या ममता दीदी आदिवासी समाज के मूलभूत समस्याओं को सुलझाने लायक कोई कदम की घोषणा करने वाली है? चाय बागानों में रहने वाले मजदूरों को न्यूनतम वेतन अधिनियम 1948 के तहत अधिसूचित सम्मानजनक और न्यायपूर्ण मजदूरी की आवश्यकता है। ममता सरकार मजदूरी के मामले को 2015 से ही लटकाते आ रही है। पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव 2016 में भी चाय बागान मजदूरों के हाथों कुछ नहीं आया। लेकिन आदिवासी और नेपाली मजदूरों की दयाशीलता देखिए उन्होंने ममता दीदी की वादों पर विश्वास करते हुए उन्हें अपना बहुमूल्य वोट थमा दिया। लेकिन मजदूरों को न तो अब तक न्यूनतम वेतन मिला न ही चाय बागानों में अपने आवास के लिए आवासीय पट्टा। चाय बागान के मजदूरों के वोटों से जीते जनप्रतिनिधि न तो न्यूनतम मजदूरी की बातें विधानसभा के अंदर करते हैं और न बाहर। मजदूरों को अपने आवास के अधिकार प्रदान करने वाले पट्टे की बातें तो डुवार्स तराई के विधायक भूल कर भी नहीं करते हैं। आखिर तृणमूल को वोट देने का क्या फायदा मिला? सवाल यह भी है कि आखिर इन विधायकों की आवाज को कौन दबाता है या ये वास्तव इनकी नेतृत्व क्षमता गुँगे और बहरे वाली हैं और स्थिति के बारे अपनी जिम्मेदारियों का इन्हें कोई एहसास नहीं है? 
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आदिवासी समाज को मिले करम त्यौहार की छुट्टी से आदिवासियों (या कहें मजदूरों) की आर्थिक हालत बदल जाती तो कितना अच्छा होता? कार्तिक उराँव कालेज में भी आदिवासियों को सिर्फ छह प्रतिशत आरक्षण ही प्राप्त है। यहाँ नौकरी कितनों को मिली ? आदिवासी उप-योजना (ट्राईबल सबप्लान) के पैसे से बने कालेज में आदिवासियों को एडमिशन और नौकरी में प्राथमिकता नहीं मिलती है। आखिर विकास का यह कैसा खेल है?
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2013 की सर्दियों में मालबाजार की एक विशाल रैली, जहाँ ममता दीदी को ऊराँव वीरांगना सिनगीदई का खिताब दिया गया था, में ममता दीदी ने घोषणा की थी कि आदिवासियों के विकास के लिए डुवार्स और तराई में पोलिटेक्निक और आईटीआई बनाया जाएगा और उन्हें व्यवसायी बनाने के लिए प्रत्येक ब्लॉक के बाजार में बिल्डिंग बना कर आदिवासियों को दुकान आवंटित की जाएगी, ताकि वे बिजिनेस के गुर सीख सकें। उन्हें डाक्टर, इंजीनियर, आईएएस बनाने के लिए कोचिंग सेंटर बनाए जाएँगे। उन्हें घर बनाने के लिए आवास पट्टा दिए जाएंगे। लेकिन सभी घोषणाएँ हवा हवाई हो गई है।
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डुवार्स और तराई के 90 प्रतिशत आदिवासी शिक्षित बेरोजगार हैं। उन्हें रोजगार मूलक प्रशिक्षण देना समाज के लिए बहुत लाभदायक होगा। रेजा कुली का काम करने वाले आईटीआई और पोलिटेक्निक कालेज में पढ़ कर सम्मानजनक आय प्राप्त करने के लिए अच्छे रोजगार पा सकते हैं। लेकिन आदिवासियों विकास की बात करने वाली ममता सरकार ने इस विषय पर आदिवासियों को सिर्फ ठगती रही है और धोखा देते रही है।
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आदिवासी विकास के लिए मिले 20 करोड़ रूपयों को आदिवासी विकास के लिए कार्य करने का दावा करने वाले नेताओं ने प्रशिक्षण संस्थान – आईटीआई और पोलिटेक्निक बनाने के लिए खर्च नहीं किया, बल्कि “गरीब आदिवासियों” के घर बनाने में खर्च कर दिए। लगता है सरकार ने गरीबों को इंदिरा आवास देने से मना कर दिया था (?)। इस पैसे से समाज के सामूहिक विकास के लिए आदिवासी नेतागण कार्यक्रम न बना सके और न ही समाज को स्वावलंबी बनाने के लिए रूपये खर्च कर सके। मतलब जिस तरह ममता बनर्जी ने आदिवासी बेरोजगारी को दूर करने और आर्थिक और सामाजिक बदलाव करने के लिए कोई कार्यक्रम नहीं बनाया, वैसे ही तथाकथित विकास के लिए कार्य करने के दावा करने वाले आदिवासी नेताओं ने भी नहीं किया। वे ऐसा करके खुश भी हैं। वे फालतू के कार्यक्रमों में रूपये खर्च करके अपनी पीठ थपथपाते हैं। 

ममता सरकार और आदिवासी नेताओं को डर है कि यदि इन पैसों को आदिवासी बेरोजगारों के प्रशिक्षण के लिए खर्च कर दिया गया तो लाखों आदिवासी प्रशिक्षित होकर अपने पैरों पर खड़े हो जाएँगे। वे अधिक कमाने लगेंगे। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधर जाएगी, वे गरीबी के चक्र से बाहर निकल जाएँगे। उनके बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढ़ कर साहब बन जाएँगे तो उन्हें कौन पूछेगा ? फिर बागान में कौन पत्ता तोड़ेगा ?
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आदिवासियों का आर्थिक और सामाजिक विकास कदापि न हो, इसके लिए ममता सरकार, आदिवासी एमएलए, आदिवासी एमपी और आदिवासी नेतागण मिल कर अनेक काम कर रहे हैं। वे नहीं चाहते हैं कि आदिवासियों का वास्तविक विकास हो।
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आदिवासी नेतागण को मालूम है जनता एक दिन नाचने गाने और पूजा करने के लिए करम पूजा की छुट्टी मिलने पर गद्गद हो जाते हैं। कुडुख भाषा को मान्यता मिलने पर सभी नाचने लग जाते हैं। सिर्फ छह प्रतिशत आरक्षण मिलने वाले कालेज की स्थापना से जनता नेताओं का जय जयकार करते नहीं थकती हैं। नेतागण इस कामयाबी का गाना हर मिटिंग में साल भर बजाते रहते हैं और कहते हैं देखो मैंने आदिवासी विकास के लिए तुम्हारे लिए करम की छुट्टी, कालेज और भाषा मांग दिया है, अब तो खुश रहे और ममता दीदी को आंख बंद करके वोट दो।
भाईयों और बहनों दीदी ने हमलोगों को सरकारी पद दिया है और साल में कई करोड़ रूपये भी मनमाने ढंग से खर्च करने के लिए मिलता है। यह अलग बात है कि हम उन पैसों को ऐसे दिखावटी और सिंबोलिक कार्यक्रमों में खर्च करेंगे, जिससे तुम्हारा आर्थिक और सामाजिक विकास न होने पाए। तुम्हें 351 रूपया हाजिरी न मिले, तुम गरीब मजदूर ही बन कर जीवन जीयो, तुम्हारा समाज बेरोजगार रहे और गरीब रहे, तुम्हें स्वास्थ्य सेवा न मिले, तुम्हे आवास का पट्टा न मिले, इसके लिए हम दिन रात काम कर रहे हैं। 
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हमें सिर्फ तुम्हारा वोट चाहिए इसके बदले में हम नकली डाक्टरों को चाय बागानों में बैठाएँगे। बागानों में तुम्हें दीन हीन बना कर रखेंगे। नकली सर्टिफिकेट से आदिवासी आरक्षण पाने वालों पर कोई कदम नहीं उठाएँगे। तुम्हारी जगह दूसरे लोग आदिवासी सीट पर नौकरी पाएँ इसकी व्यवस्था करेंगे। आदिवासी आरक्षण से तुम आफिसर न बनो इसके लिए हमलोग काम करेंगे। टीएसी की बैठक होने वाली है, लेकिन इस बैठक में हम आदिवासी आर्थिक और सामाजिक दशा बदलने के लिए कोई निर्णय नहीं करेंगे। आखिर तुम्हारी औकात ही क्या है? तुम्हारी औकात सिर्फ हमें वोट देने का है, बाकी हम जो चाहेंगे वह करेंगे।