झारखण्डी लोक जीवन में कला और संस्कृति

                                                                                                                                                                        नेह अर्जुन इंदवार

​           प्राकृतिक सौंदर्यता को जीवन में उतारने और ढलने का प्रयास ही कला की उत्पति का पहला चरण होता है। आदिवासी समाज हमेशा प्रकृति की गोद में बसा हुआ समाज रहा है। इसीलिए आदिवासी समाज में कला प्राकृतिक सौंदर्य से प्रेरित रहा है और आदिवासी कला का मूर्त अमूर्त स्वरूप का दर्शन भी प्राकृतिक प्रतिमानों में ही मिलते हैं।  

          आदिवासी समाज में कला प्रदर्शनी और कौतूहल का विषय और वस्तु कभी नहीं रहा, बल्कि कला सामाजिक जीवन जीने के एक भाग के रूप में जुडा हुआ रहा है। कलाकारों की कलाकरी जीवन की आवश्यकता और अपरिहार्य अंग रहे हैं। कला की चर्चा और समीक्षा का विशेष सत्र् का आयोजन शायद ही कहीं किया जाता रहा होगा। कामसूत्र के लेखक वात्सायन ने लिखा है कि समाज में 64 प्रकार के कला होते हैं। लेकिन संसार के अधिकतर कला पारखियों ने पारंपारिक समाजों में छह कलाओं को प्रमुख माना है। जिसमें स्थापत्य कला, मूर्तिकला, चित्रकला, संगीत, काव्य, नृत्य, रंगमंच आदि है। आदिवासी समाज में अखरा एक अन्यतम रंगमंच हैं जहाँ बिना रोकटोक सभी अपने भावनाओं के साथ शामिल होते हैं। अखरा में नृत्य करते-करते आशु गीतों की रचनाएँ आदिवासी कला की अप्रतिम गुण है।  शेष सभी कला जीवन जीने के विभिन्ऩ रूपों में दृष्यगोचर होते हैं।  

          दुनिया के अन्य सामाजों की तरह ही झारखण्डी समाज में व्यक्तिगत कला और लोककला समाज और आदिवासी संस्कृति के अंग-अंग में बसा रचा हुआ है। आदिवासी कला के दर्शन के लिए सम्पूर्ण समाज को बारीकी से निहारने, मनन करने और उसे आदिवासी जीवन और व्यवहार से रिलेट करने की जरूरत होती है। समाज में पारंपारिक रूप से कहीं कोई कला वीथी अलग ढंग से प्रदर्शऩ के लिए यह पारखी निगाहों से समीक्षा करने के लिए नहीं बनाई गई है। यदि मूर्तिकला और स्थापत्य कला की बातो की जाए तो आदिवासी समाज में अपनी जीवन आवश्यकतानुसार इसका भी स्थान अहम है। लेकिन आराधना के लिए मूर्ति कला का विकास आदिवासी समाज में नहीं हुआ । इसका प्रमुख कारण आदिवासियों का ईश्वर को अमूर्त प्राकृतिक रूप में देखने के विश्वास में खोजा जा सकता है।

          आदिवासी समाज हजारों सालों से अन्य समाजों से अलग थलग रहा है और उसका जीवन यापन करने का ढंग सर्वथा दूसरे समाज से अलग रहा है। जाहिर है कि कला का विकास जीवन जीने का ढंग, सांस्कृतिक आचार-व्यवहार और व्यावहारिक आवश्यकता पर निर्भर करता है। कला का अविष्कार हवा में जादू से मूर्त वस्तुओं का अविष्कार नहीं की तरह कोई अव्यावहारिक अविष्कार नहीं है और इसका विकास जीवन की आवश्यकता के सापेक्ष होता रहा है और आमोद प्रमोद प्रिय होने के बावजूद सिर्फ नयन सुख के लिए अजीब अबूझ कला का अविष्कार और विकास आदिवासी समाज में नहीं हुआ।

          कला के विकास को समझने के लिए सबसे प्रथम हमें मनुष्य की आंखें और दिमाग के विन्यास को समझने की जरूरत है।  मनुष्य की आँखें किसी सुंदर दृष्य या वस्तु दो देख कर ठिठक जाती है। प्राचीन काल से ही मनुष्य की आँखें फूल, पत्ते, पेड पौधे, पहाड, जंगल, नदी, झील, चाँद, तारे, नील गगन, बादल, इंद्रधनुष आदि की सुंदरता को निहारता रहा है और प्राकृतिक आंचल में बिखरी सौंदर्य को अपनी आँखों और जीवन में बसाने का प्रयास करता रहा है। सौंदर्य का पैमाने हर व्यक्ति विशेष के साथ बदलता रहता है और हर एक इंसान की आंखें हर वस्तु में अलग अलग सुंदरता की पहलु ढूँढ लेता है। जो वस्तु एक जोडी आंखों को जरा भी आकर्षित नहीं करता है, वही वस्तु या विषय दूसरी जोडी आंखों को मंत्रमुग्ध कर देता है। इसीलिए सौंदर्य भावनाओं के प्रथम ज्वार को आंखों के खिडकी के साए से गुजरे लहरें कही जाती है।

          संसार भर में कला और सौंदर्य का उट्फूटन नारी देह, उनकी आदाओं, कोमल अंगों, वाणी और उनके व्यवहार और रूप में माना गया है और दुनिया के अधिकतर कलात्मक चित्रकारी में नारी को उकेरा गया है। आदिवासी समाज में भी सौंदर्य को नारी का प्रतिरूप माना गया है। आदिवासी कला और सौंदर्य प्रासाधन नारी को सामने रख कर ही किया गया है। खोंगसा या आज के जमाने की क्लिप आदिवासी नारियों का प्रिय मेकअप-सामान हुआ करता था। गले और हाथों की सौंदर्यता को बढाने के लिए हँसली और कंगना पहने जाते थे। हाथ गले और छाती तथा वक्ष पर खोदा या गोदना लगाने का रिवाज कब से चला इसका पता शायद ही किसी शोध से पता चले।

          एक डेढ दो सदी पूर्व तक आधुनिक पहनावे से आदिवासी समाज बहुत कम परिचित था। गैर आदिवासी समाजों से संपर्क में आने वाले आदिवासी आधुनिक पोशाकों के बारे जानते भी थे लेकिन वे उसे एक गैर आदिवासी पोशाक ही समझा जाता रहा। यदि उन पोशाकों में कोई उत्सुकता रही भी होगी तो भी उनकी उपलब्धता तक पहुँच आदिवासी समाज में नहीं था। इसके कई कारण रहे हैं लेकिन आदिवासी समाज में ऐसे पोशाक का एक दो चलन सरकस में अजीब पोशाकों में सजे जोकरों का सा लगता रहा होगा।

          आदिवासी पुरूषों में कपडे की आवश्यकता बहुत कम रही थी, लेकिन महिलाएँ सजने संवारने में विश्वास करती थीं और वे साडियों में बेलबुटे या फूलों का प्रयोग करती थीं। कलात्मकता की समझ महिलाओं में प्राकृतिक प्रदत्त गुण है और आदिवासी नारी भी इससे अछुते नहीं थीं। झूला या ब्लाउज का चलन बहुत बाद में हुआ। लेकिन झूला पुरूष सार्ट की तरह लम्बे हुआ करतीं थी और उसमें पुरूषों के सार्ट की तरह पाकेट हुआ करता था।

          आदिवासी समाज में पारंपारिक कपडे चीक बडाइक करते हैं और वे सूत कातने से लेकर कपडे बुनने, उसका डिजाइन तैयार करने, रंग रोगन करने आदि के सभी कार्य खुद किया करते थे। कपडों में किए जाने वाले तमाम कार्य, शिल्पकारी पारिवारिक स्तर पर किया जाता रहा है। बुनकर समाज होने के कारण कपडे बनाने के सभी कार्य, जिसमें हाट में बिक्री से लेकर आवश्यकतानुसार घर घर पहुँचाने और कपडे के बदले आनाज या दूसरी जिन्स लेने तक का कार्य चीक बडाइक परिवार खुद करते थे। शादियों में आजी लेदरा, नये दम्पत्ति को बरकी देने की परंपरा के कारण हर गाँव में शादी-विवाह वाले घर में इन कपडों की फर्माइश हुआ करती थी और कपडे बुनने की पारंपारिक कला के कारण चिक बडाइक आदिवासी समाज में खाते पीते समाज के रूप में जाना पहचाना जाता था।

          पहनावे के माध्यम से शारीरिक सौदर्य को निखाने का रिवाज और तत्कालीन समाज में उसकी बढती मांग के कारण चिक बडाइक समाज में कपडो पर विभिन्न प्रकार से प्रयोग करने और उसे अधिक कलात्मक बनाने की उत्सुकता और दबाव ने कपडों के नये डिजाइन बनाने के लिए प्रेरित किया और जो साडी और गमछा पहले सिर्फ सफेद हुआ करते थे वह उतरोत्तर रंगीन होने लगे। बेलबुटे या झालर का प्रयोग उसे नये रूप देने लगे।

          कपडे बुनने की यह कला बाद में रूई या कटन से चल कर सिल्क तक पहुँच गई और दुनिया को छोटानागपुर के टसर सिल्क का परिचय मिला। पुराने कपडों का प्रयोग छोटानागपुर के कंपकंपाती ठण्ड से बचने के लिए लेदरी बनाने के काम में आता था। लेदरी में भी नक्कासी करने का चलन बना जो बाद में एक कला का रूप अख्तियार कर लिया। विभिन्न प्रकार के रंग बिरंगे, बुटेदार लेदरी बना कर हाट में बेचा जाता था। सुंदर लेदरी बनाने के लिए भी दक्ष हाथ चाहिए होते थे और इसकी कला का सराहना भी किया जाता था। लेकिन आधुनिक ऊनी कंबलों का चलन लेदरी सिलाई पर भी भारी पडा और आज भी कहीं कहीं इसे अपनी घरेलु आवश्यकता के लिए बनाया जाता है।

          आदिवासी समाज हजारों साल तक आत्मनिर्भर समाज हुआ करता था। दैनिक जीवन और विशेष आवश्यकता की सभी चीजों का निर्माण खुद करता था।

          लकडी, मिट्टी, कच्चे इंट और पत्थरों से आदिवासी समाज सुंदर और मजबूत घर बनाते रहे हैं। दीवारे खुब मजबूत होती थीं। दीवारों में समान रखने के लिए दिरखा और अलमारी बनाने की परंपरा आदि युग से रहा है। दीवारों के बाहर आंगन और आंगन के चारों और चारदीवारी बनाना आदिवासी मकान बनाने के खास तरीके हुआ करते थे। हर घर में किसी एक कमरे में माचा अर्थात सामान रखने के लिए छत के नीचे एक फ्लोर बनाया जाता था। कृषि उपज के जिन्स जैसे आलू, प्याज वगैरह वहाँ रखे जाते थे। चुल्हा के उपर बनाए गए माचा में रखे सामान सडते नहीं थे, और वह साल, दो साल तक खराब नहीं होतो थे। लकडी के दरवाजे के पट्ट में नक्कासी करने का चलन भी रहा है। 

          मिट्टी के घरों के फ्लोर को गोबर से लीपा जाता है और लीपने के लिए महिलाएँ विभिन्न प्रकार के रेखांकन बना कर लीपती रहीं है। घरों के दीवारों को भी लीपते वक्त कुछ विशेष मनमोहक आकार देकर लीपा जाता है। घरों में, विशेष कर शादी विवाह के मौकों में दीवारों को गाँव के आसपास मिलने वाले सफेद मिट्टी या चूना मिट्टी से लीपा जाता है और विभिन्न प्रकार के चित्रकारी की जाती है। इसमें आदमी, स्त्री, फूल, पत्ते, घडा, नृत्य, नगाडे, मांदर, ढोल, वन, जंगल, चिडियों के चित्र उकेरे जाते हैं। इन चित्रों के चित्रकार कुछ खास कलाकार होते हैं जो अवसर विशेष में घरों के सजाने के लिए चित्रकारी करने के लिए बुलाए जाते हैं। चित्रकार अपने चित्रकारी कलाकारीता को पेशागत नहीं बनाकर एक सामाजिक सहयोगी के रूप में मकान मालिकों की सहायता करते हैं। जहाँ गैर आदिवासी समाज में कलाकारी एक पेशागत कार्य होता है, वहीं आदिवासी समाज में यह शौकिया चित्रकरिता के रूप में मिलते हैं। इन आदिवासी कलाओं में आदिवासी में आदिवासी जीवन के अलंकरण, सज्जाकारी के तरीके के द्वारा आदिवासी इतिहास और मिथकों को भी उकेरने की कोशिशिं की जाती है। हर कला की तरह इसमें भी मानवीय बोध को गुंफने की कोशिश की जाती है।
 
          आदिवासी समाज में जंगल और पेड खास मायने रखते हैं। समाज जंगल पर अनेक चीजों के लिए आश्रित होता है। बांस, सखूआ, बेंत आदि का प्रयोग व्यापक स्तर पर होता है। बांस के खैचला, सूप, डागरा, कंघी, गेडुआ, हँसुआ, बरछा, तीर, धनुष, पिंजरा, पशु बाडा आदि अनेक दैनिक प्रयोग में आने वाली चीजें बनाई जाती है। लाली के पेड से खटनाही आदि बनाए जाते हैं और उसके बनाने वाले कलाकारों की बहुत मांग होती थी।

          इंदरा या कुआँ की खुदाई भी दक्ष लोग की किया करते हैं, विशेष कर चट्टानों को एक विशेष आकार प्रकार में बडी सफाई से काटना और इंदरा बनाने के लिए करीने से इस प्रकार सजाना की वह बरसों या सदियों तक मजबूती से अपनी जगह बनी रहे। चट्टानों को काट कर घरों के दीवार बनाने की रिवाज रही है। चट्टानों से सिलपट, सिल, बैठने के चेयर, मेज, पीढा आदि बनाए जाते थे और इसमें लम्बा अनुभव और दक्षता की जरूरत होती है। नयनाभिराम, आकार प्रकार देने, उसे जोडने, तराशने के काम इस कार्य में उस्ताद कलाकार ही करते हैं। अनेक आदिवासी गाँवों में उपलब्ध चट्टानों को ही समतल करके नृत्य का आखरा बनाया जाता था या औखल की जगह उसे करीने से काट तराश कर ओखल का रूप दिया जाता था।  इन चट्टानों के समतल करके धान मिसने के लिए खलिहान बनाया जाता था और बारिश के दिनों में गाँव की बैठकी, पंचायत या धान सुखाने के लिए काम में लाया जाता रहा है।

          कृषि कार्य में रत्त आदिवासी समाज अपने कृषि उपकरणों का सृजन और उत्पन्न खुद ही करते रहे हैं। हल, कुल्हडी का बेंट, हँसुआ, दबिया, छूरी में लगने वाले हथुआ आदि आदिवासी समाज में कुछ खास लोग ही सुंदर, सुघड रूप में बनाते हैं। मछली मारने का जाल, डोंगी, नाव, तेल निकाने का कोल्हू, ढेकी, मुर्गी कुसली, पगहा, फसल को सुरक्षित रखने का मोरा आदि आदिवासी खुद बनाते थे और इसकी कलात्मकता को धार देना कुछ कलाकारों की खास कलाकारी होती थी।
आदिवासी होडोपैथी में पुरानी चीजों का बहुत प्रयोग किया जाता है। पुरानी घी, मधु, सुअर की चर्बी आदि को विभिन्न दवाओं के लिए अनिवार्य समझा जाता था। इन चीजों को दस बीस या तीस चालीस वर्ष संजोकर रखते थे। इन्हें रखने के लिए कोंहडा, लौकी, चमडे के थैली आदि का प्रयोग किया जाता था, जिसे खास ढंग से बनाया जाता था।

           आदिवासी समाज में जहाँ कपडों के लिए चिक बडाइक में शिल्प की जानकारी थी, वैसे ही लोहा गलाने के काम में असुर लोगों की कलाकारी जग जाहिर है। कहा जाता है कि असुरों में लोहा गलाने का ज्ञान था कि उनके गलाए गए लोहे में जंग नहीं लगते है। लेकिन अब यह विशेष ज्ञान विलुप्तप्रायः हो गया है और शायद अब किसी को इसकी जानकारी नहीं सौंपी जा सकी है। लेकिन लोहा के पांरापारिक दैनिक काम को लोहारा समुदाय दक्षता के साथ करता आया है जो आज भी कमोबेश जारी है। लोहरा समुदाय कृषि, शिकार, घरेलु कार्यों में आने वाले सभी लौह उपकरणों का उत्पादन और विकास करते थे। हल का फार, हँसुआ, कुल्हाडी, तलवार, बरछा, तीर, इंदरा से पानी निकालने का कुंड आदि सभी का उत्पादन लोहरा समुदाय ही करता रहा है।

           आदिवासी समाज के आमोद प्रमोद, गीत गोबिन्द में मांदर, नगेडा, ढोल, ढाँक शहनाई का विशेष महत्व है। छोटानागपुर के गाँवों मे कुछ दशक पहले तक बियारी या रात के भोजन के बाद अखरा में मांदर की ताल गुँजने लगता था। नृत्यगणें मांदर की आवाज सुन कर समूह में अखरा में जाकर मौसम और पर्व त्यौहारों के अनुसार गीत गाते हुए झुम उठतीं थीं। पुरूष भी अपने मांदर या झांझ के साथ ताल में ताल मिलाते मगन होकर नृत्य करते थे। छोटानागपुर में कहावत है बारे महीना तेरो परब अर्थात हर महीने एक दो परब और उस परब के लिए अलग गीत, मांदर की अलग धुन, अलग नृत्य, नृत्य में अलग गति, अलग मानसिक तान। आदिवासी समाज में हर मौके पर मांदर और नगाडे बजते थे और हर अवसर पर सामूहिक नृत्य होता है। आदिवासी शादी में ही दस तरह के अलग अलग नृत्य किए जाते हैं। सबसे दिलचस्प और विचारनीय नृत्य बराती और सराती के बीच होने वाले मेरघेरैय नृत्य होता है। जिसमें एक दूसरे को घेर कर विपक्षी दल को अलग थलग करने की कोशिश की जाती है और उनके घेरे को तोड कर उसमें घुसने की कोशिश की जाती है। यह कई मायनों में युद्ध का रूप होता है। सबसे अधिक विचारनीय तत्व उस दौरान गाए जाने वाले गाली गीत होते हैं। जिसमें दूसरे के लिए अश्लिल गालियों का प्रयोग किया जाता है। शादी में दो परिवार और दो गाँव या कुटुँब के लोग मिल कर एक होते हैं, उनके बीच प्रेम की गीत गाए जाने के बदले गाली गीत गाने के क्या मायने है, इस पर शोध करने की जरूरत है। क्या शादी मेरघेरैय नृत्य में किसी प्रकार की कोई ऐतिहासिक लडाई की बात छिपी हुई है, या गाली के माध्यम से परिचय के झिझक को दूर करने की कोई मनोवैज्ञानिक पहलू छिपी हुई है ??

           आदिवासी वाद्य जैसे मांदर, नगडा, ढाँक को महली समुदाय बनाते है, वहीं शहनाई का निर्माण अलग अलग समुदायों के दक्ष कलाकारों द्वारा किया जाता रहा है। बांस के सामानों के लिए तुरी समुदाय की दक्षता या कलाकारी के सामने सब नतमस्तक होते रहे हैं। गोदना गोदने का काम भी समुदाय की महिलाएँ करती रहीं हैं। इनका गोदना स्थायी होता है और शरीर में हमेशा के लिए गोदित हो जाते हैं।

           आधुनिकता और औधोगिकीकरण के कारण पारंपारिक कला का क्षय बडी तेजी से हो रहा है। आज आधुनिक शिक्षा पाकर आदिवासी अपने हाथों और दिमागों में सदियों से संचित कलाकारी को या तो छोडते जा रहे हैं या भूलते जा रहे हैं। कहीं चाहते हुए भी उसका संरक्षण विभिन्न कारणों से नहीं  हो पा रहा है।
पारापारिक कला का विकास किसी एक दिन या एक पीढी में नहीं होता है। उसका मूर्त रूप दिमाग में प्रथम बार अमूर्त रूप में प्रगट होता है फिर वह धीरे धीरे व्यक्ति विशेष के हाथों से एक अलग रूप में आकार लेता है। उसका लम्बा विकास काल की प्रक्रिया कई चरणों में होती है।  

            18 वीं सदी में आदिवासियों के बडी संख्या में छोटानागपुर से असम और बंगाल के डुवार्स तराई इलाकों में ले जाया गया। आदिवासी समाज के साथ आदिवासी कला और सांस्कृतिक प्रतीक भी इन जगहों में गए, लेकिन वहाँ समाज उन्मुक्त जीवन जीता आदिवासी समाज नहीं रह गया था। उसके जीवन में अचानक एक बडा परिवर्तन आया जो पारंपारिक आदिवीसी कला और संस्कृति की अस्तित्व और विकास के लिए डेथ बारंट साबित हुआ।

          वहाँ तत्कालीन ब्रिटिशकालीन समय में मजदूर के रूप में काम करने वाले आदिवासी चाय बागान कंपनियों के बंधुआ मजदूर थे और उऩ्हें कलात्मक, रचानात्मक जीवन जीने की आजादी नहीं थी और न ही अवसर। किसी समुदाय के रचनात्मकता और सृजनात्मकता को को खत्म करने के लिए उनके उन्मुक्त जीवन और मुक्त सोच व्यबहार को खत्म कर दिया जाना फांसी की सजा सुऩाए जाने के बराबर ही होता है।

          उन्हें सुबह सात बजे से सायं 6 बजे तक अस्वास्थ्यकर चाय के बागानों में पसीना बहाना होता था और रात को खा पी कर आराम करना होता था। उन्हें अपने काम के दौरान और बस्ती में मलेरिया के मच्छरो से युद्ध करना होता है। जहरीले सांप और दूसरे खतरनाक जानवरों से दो चार होना होता था। तब मलेरिया की दवा का ईजाद नहीं हुआ था, और तेज बुखार से आए दिन किसी न किसी की मौत होती थी। जानवरों से होने वाली मौत को स्वाभाविक मौत मानने की विवशता थी। उनके पास पीने का साफ पानी न था और न ही स्वास्थ्यकर रहने का स्थान। खाने पीने की व्यवस्था और उपलब्धता वैसे नहीं थी, जैसे उनके शरीर सदियों से आदी था। छोटानागपुर संताल परगना, तत्कालीन मध्य प्रदेश और उडिसा से चाय बागानों में ले गए मजदूर रात को अपने ढोल, नगाडे, मांदरों की ताल पर झुमते थे और गम को भूलाते थे। संस्कति और कला के नाम पर सिर्फ यही कार्य करने की अनुमति थी उन्हें।

          विषम परिस्थितियों में जीवन जीने वाला समाज में कला और संस्कृति का सृजन और विकास नहीं होता है और वह अपनी कला संस्कृति थाती को भी संरक्षित करने में असमर्थ होता है। और यहाँ भी आदिवासी समाज के साथ यही हुआ। पारंपारिक कला और संस्कृति धीर-धीरे भुलते गए और इसे जानने की ललक खत्म हो गया। आमोद प्रामोद की मानसिक और शारीरिक जरूरतें आधुनिक हिन्दी और बंगला सिनमाई गीत संगीत ने ले लिया। मांदर नगाडे, शहनाई, बांसुरी आदि के बिना ही आदिवासी जीना सीख लिया। बियारी के बाद आखरा में मांदर की ताल कहीं बाजता है, ऐसी हर्षदायक आवाज कहीं से नहीं आती है।
विस्थापन का शिकार सिर्फ आदमी ही नहीं होता है, उसका सबसे बडा शिकार सामाजिक सरिता में कल कल बहने वाला भाषा संस्कृति और कला भी होती है। यह संकट हर विस्थापन में होता है। चाय बागानों में रहने वाले आदिवासी फिर भी अपनी आदिवासियत को बचा कर रख रहे हैं। लेकिन कला की मौत की सांस अभी धीरे धीरे चल रहा है और निकट भविष्य में अंतिम सांस निकलेगी। This work is copyright © Neh Arjun Indwar, July. 12, 2016. All rights reserved.

झारखण्ड का सबसे बड़ा ख़जाना

​                                                                                                                                                                                       नेह अर्जुन इंदवार

​सन् 2001 की बात है ।

मैं अपने भुवनेश्वर के अपने  मित्र जमादार गोडसोरा के साथ सुबह 4 बजे भुवनेश्वर से राँची जाने के लिए मोटरबाइक से निकला । हम किसी विशेष काम से नहीं निकले थे, बल्कि बाइक से रास्ते के आदिवासी गाँवों में जाकर वहाँ के लोगों से मिलना जुलना और बात करना चाहते थे । दोनों शहरों के बीच की 400 किलोमीटर की दूरी बाइक सवारी के लिए वाकई काफी लम्बी है । लेकिन हमारी मंजिल थी राँची ।

हम बहुत जोशिले और उत्साहित थे । कई वर्षो के बाद राँची जाना जा रहा था । दोस्तों से मिलने की खुशी और रास्ते के आदिवासी गाँवों में जाकर लोगों से खूब बातें करने की चाहत । करीबन 100 किलोमीटर जाने के बाद ही बडे़ आदिवासी गाँव दिखाई देने लगे । हम खेतों में काम करते लोगों के पास जाते और गोडसोरा ”हो“ में बात करते । और मुझे हिन्दी में बताते । चूंकि गाँववाले हिन्दी बोल व समझ नहीं पा रहे थे । मैं हिन्दी में बोलता और वह अनुवाद करके किसानों को ”हो“ में बताते ।

दशकों बाद किसानों से बातें हो रही थी । एक जगह कई महिलाएँ डियेंग (हँडिया) बेच रही थी । हम उनके पास गए और उनसे काम, घर परिवार और डियेंग बेचने के बारे बात करने लगे । वे अपने खेती-बारी, खेत-खलिहान और घर-परिवार की बातें बता रही थीं और मैं एक डायरी में नोट कर रहा था । उनके जीवन संघर्ष की बातें, पिछले कई दशकों में गाँवों में आए परिवर्तन को हम करीब से जान रहे थे ।

हम भुवनेश्वर जैसे दूर के शहर से आ रहे हैं यह जानकर वे हमारी थकावट को दूर करने के लिए डियेंग  पीने का अनुरोध किए । हमने मुस्कराकर कर धन्यवाद दिया कि अभी हमें बाईक से सफर करनी है डियेंग हमारे लिए भारी हो जाएगा । यह डियेंग चावल को पूरी तरह से मथ कर बनाया जाता है और उसमें चावल का अंश होता है । डियेंग पीने से पेट भर जाता है, इसका नशा बहुत असरदार होता है । अभी हम रास्ते के क्योंझर शहर नहीं पहुँचे थे और एक जंगल से गुजर रहे थे तभी एक कील बाइक के अगले पहिये में घुस गया । अब हमारे पास पैदल चलने के सिवा कोई चारा नहीं था । पठारी ऊँचाई पर धकेल कर बाइक ले जाना काफी थकावट भरा काम होता है । हम थक कर लतपत हो चुके थे । हम गुजरते ट्रकों से लिफ्ट मांगते लेकिन माल लदा ट्रक नहीं रूकता । बहुत चेष्टा के बाद एक खाली ट्रक आया और हम अपनी हीरोहोंडा उसमें लादने में कामयाब हो गए और क्योंझर आ गए । वहाँ पंक्चर ठीक किए और आगे बढ़ गए । लेकिन शहर से निकलने के बाद ही पेट में चूहे दौड़ने लगे । दोपहर के तीन बज चुके थे, पंक्चर के चक्कर में हम कुछ खाना ही भूल गए थे । हम कई ढाबों में गए लेकिन वहाँ की गंदगी और भिनभिनाती मक्खियाँ देखते ही मैं वहाँ खाने से इंकार कर देता । हमने बिस्कुट से काम चला लिया ।

हम झारखण्ड की सीमा में दाखिल हो चुके थे । झारखण्ड की मिट्टी को हमने माथे पर लगाया और प्रणाम किया । फिर हम आगे बढ़ गए । हम एक पेट्रोल पंप से पेट्रोल ले रहे थे तभी गोडसोरा का एक परिचित दिख गया । वह पास के एक गाँव से था । उसने अपने घर चलने का आमंत्रण दिया और हम उसके साथ हो लिए । उसने कहा खाना तो बन नहीं सकता है, लेकिन डियेंग मिल सकता है । हमने बिस्कुट खाया था इसलिए तुरंत कुछ खाने की आवश्यकता नहीं थी । परिचित जी ने हमें थोड़ा सा डियेंग का स्वाद लेने का अनुरोध किया । हमने थोड़ा सा डियेंग आलू के चखने के साथ लिया ।

चखना को चखने के बाद ही जैसे मुझ पर जादू सा छा गया । इतना स्वादिष्ट आलू ! मैं उनसे और आलू मांग-मांग कर लिया, पेट भरा होने पर भी काफी आलू खा गया । दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, भुवनेश्वर में मैंने वर्षो गुजारा है । हैदराबाद के आसपास के जिलों में हम बाइक से अक्सर घूमने जाते और वहीं तेलगु सीखने के लिए ग्रामीणों के घरों में खाना खा लेते थे । गुजरात के गाँवों में भी खुब घुमना हुआ है । महाराष्ट्र के अधिकतर जगहों पर जाना हुआ है । हर जगह के खास व्यंजनों को चखने का अवसर मिला है । लेकिन यहाँ तो आलू ने जैसे मंत्र ही मार दिया । आलू की वह सब्जी हमारे होस्ट ने कुछ मिनटों में जैसे-तैसे मर्दाना स्टाइल में सिर्फ डियेंग के साथ खाने के लिए बनाया था । पाक कला की कोई करामत नहीं अजमाई गई थी, न ही उसमें कोई मसाला डाला था सिर्फ हल्दी, नमक और मिर्ची से बना था वह नयाब सब्जी । 

मुझे एक ख़जाना मिल गया था । स्वादिष्ट आलू की वह एक प्रजाति है जो छोटानागपुर के गाँवों में ही मिलती है । दिन भर की थकावट छूमंतर हो चुकी थी । शायद यह डियेंग और उस जादुई आलू का असर था । हम पास के साप्ताहिक हाट में जा पहुँचे और वहाँ जाकर देखा जितना बड़ा हाट उतना बड़ा डियेंग का बाज़ार । लोग डियेंग के साथ अलग-अलग चखना खा रहे थे । हमने डियेंग का पैसा चुकाया लेकिन उसे पीने के लिए दूसरों को दे दिया और अलग-अलग सब्जी से बना चखना खाने लगे । वहाँ बेचे जा रहे चखना भी घर में बने आलू की तरह ही स्वादिष्ट थे । चखने का हर कौर हमारे लिए एक अनुभव था और हम उस अनुभव को ठूँसे जा रहे थे । जब हम हाट से निकले और काफी दूर चले गए तो पता चला, चखना खाने के रौ में मैं अपना डायरी वहीं भूल आया । मैंने जोर का ठहाका लगाया । गोडसोरा चौंक कर मुझे देखने लगा ।
क्या हो गया ?
लेकिन असली डायरी तो मैं साथ लेकर आया हूँ । मैंने अपना जीभ उन्हें दिखाया । वह भी जोरदार ठहाके लगाने लगा । अब हम दोनों फिल्म शोले के जय और बीरू की तरह बाइक में गाना गाते हुए चलने लगे ।

पहली मई 2014 को संजय पहान की शादी में शरीक होने के लिए फिर से राँची जाना हुआ और कोलकाता वापसी से पहले मटिल दीदी को ढेर सारा सब्जी बाजार से खरीदवा लिया । कोलकाता आकर सबसे पहले बेंग साग की सब्जी बनवाया । वाह ! क्या स्वाद है । मेरे मुँह से निकला । सभी ने जी भर का बेंग साग का लुफ्त उठाया । वाकई में बहुत स्वादिष्ट था साग । डुवार्स में हम अक्सर बेंग साग खाते रहते हैं लेकिन छोटानागपुरी बेंग साग का स्वाद कमाल का था । हफ्ते भर राँची से लाई गई दूसरी सब्जियाँ भी बनती रही । कोई दिल को उसी तरह बाग-बाग करता रहा और कोई कोलकाता में मिलने वाली सब्जियों की तरह ही साधारण स्वाद वाली थी ।

एक ही हाट, बाज़ार में मिलने वाली सब्जियों के स्वाद में इतना फर्क क्यों होता है ? इसका मुख्य कारण खेत में उपयोग किया जाने वाला खाद है । बेंग साग उपजाने के लिए किसी खाद की जरूरत नहीं होती है, वह प्राकृतिक तरीके से उगती है, जबकि दूसरे सब्जियों के मामले में अधिक उपज के लिए किसान रासायनिक खाद अर्थात् फार्टिलाइजर आदि का उपयोग करता है । रासायनिक खाद उपज बढ़ाने में मदद तो करता है लेकिन वह जमीन के औषधीय और प्राकृतिक गुण को खत्म कर देता है । यह प्राचीन काल से विकसित हो रहे अन्न में उपस्थित गुणों के तत्वों में बदलाव कर देता है ।

हर जगह की धरती के ऊपरी परत की मिट्टी अलग-अलग होती है । उस मिट्टी में अलग-अलग वनस्पति उगते हैं, पनपते हैं और हर जगह के वनस्पति में उस जगह विशेष की मिट्टी की सुगंध और औषधीय गुण रची बसी होती है । यही अन्न उस खास जगह के मनुष्य के लिए स्वास्थ्यकर होता है और वह कालांतर में उस जगह के निवासियों के लिए औषधि का काम करता है । प्राचीन काल से छोटानागपुर की धरती पर रहने वाले आदिवासी यहाँ के एक-एक कण, एक-एक पत्ते से परिचित हैं और वे यहाँ की धरती पर हमेशा खुशहाल, चैनशील और स्वस्थ रहे हैं । सौ-सौ साल तक मजबूत और स्वस्थ रहने वाले आजा, नाना की यादें अभी भी ताजी है । टाना भगत आंदोलन के दौरान नगर ठिठाईटांगर के फागू भगत, अघनु भगत टैक्स के बारे जानने के लिए राँची के कलेक्टर से मिलने के लिए सिसई से पैदल आए थे । वे कई दिनों तक रोज कलेक्टरेट जाते और कलेक्टर से बातें करने का अनुरोध करते, लेकिन कलेक्टर ने उनकी ओर आँख उठा कर भी देखने की जहमत नहीं उठाई । नाराज़ होकर फागू भगत ने ‘‘कलेक्टर साहेब हमसे बात कीजिए’’ कहते हुए आॅफिस में प्रवेश करते ही कलेक्टर की बाँह पकड़ ली । उनके बाॅडीगार्डस् फागू भगत के हाथों के बंधन छुड़ाने के लिए पूरा जोर लगा दिए, लेकिन छुड़ा नहीं पाए । डर के मारे कलेक्टर ने उससे बात करना स्वीकार किया और तुरंत टाना भगतों के खेतों के लगान को माफ करने की घोषणा कर डाली । यह किस्सा हम फागू भगत जिन्हें हम आजा कहते थे के जुब़ान से ही सुने थे, तब उनकी उम्र एक सौ दस वर्ष थी और तब भी वह अपनी चार वर्षीया नातीनी मनीर को गोदी लेकर गाँव की सैर करते थे ।

तब उनके जैसे न जाने कितने आजा और नाना लम्बी उम्र के साथ-साथ स्वस्थ शरीर के भी मालिक होते थे और जिंदगी का भरपूर आनंद लेते थे । यह स्वास्थ्य इक्का-दुक्का व्यक्तियों की नहीं हुआ करती थी, बल्कि समाज की नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी ऐसे ही स्वास्थ्य का आनंद उठाती थी । सुबह की प्रथम लाली के साथ ही बिस्तर से उठ जाना, दिन भर जी-तोड़ शारीरिक मेहनत करना और छोटानागपुर के मिट्टी पर उपजे साधारण, लेकिन प्राकृतिक स्वाद और गुणों से लबालब अन्न खाना और शाम ढलते ही अखरा में गीत-नृत्य में तल्लीन हो जाना । यही दिनचर्या था आदिवासियों के पुरखों का । कहीं कोई अस्पताल, चिकित्सालय नहीं था । जो भी था वह था होड़ोपैथी, जो आदिवासियों के परंपारिक ज्ञान पर आधारित था । यह ज्ञान भी अधिकतर छोटानागपुर की वादियों में मिलने वाली वनस्पतियों पर ही आधारित था । और यह वनस्पति छोटानागपुर की मिट्टी की पैदाइश होती थी । बात आती है यहाँ की मिट्टी की । यह मिट्टी ही यहाँ के वनस्पति, अन्न को दुनिया का बेहद स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकर वनस्पति, अन्न बनाता है ।

लेकिन आधुनिकता का अंधानुकरण किए जाने के कारण छोटानागपुर की प्राचीन मिट्टी की गुणवत्ता खत्म होते जा रही है । खेतों को जोत कर व्यवस्थित ढंग से उगाए जाने वाले फसल के लिए रासायनिक खाद का प्रयोग करने के कारण यहाँ की मिट्टी की उर्वरता और स्वास्थ्यकर प्राकृतिक गुण समाप्त होने को है । साग-सब्जियों, मोटे चावल-दाल आदि के खेती के लिए किसानों द्वारा उपयोग किए जा रहे रासायनिक खाद पर उपयोग संबंधी कोई नियंत्रण नहीं है । यह यहाँ की जादुई मिट्टी पर भी बेरोक-टोक, अंधाधुंध प्रयोग किया जा रहा है । समाज में इस विषय पर कोई पहल नहीं की गई है । जहाँ कहीं रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं हुआ है वह मिट्टी और उस पर उपजे वनस्पति की गुणवत्ता, स्वाद और नस्ल बची हुई है । यही कारण है कि बेंग साग अत्यंत स्वादिष्ट लगता है, लेकिन सभी सब्जी दिल को जीत नहीं पाते हैं ।

यह एक अत्यंत गंभीर और महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर समाज और सरकार को तुरंत कदम उठाने की जरूरत है । छोटानागपुर के गर्भ में अनेक खनिज पदार्थ पाए जाते हैं, जो कालांतर में सरकार और बड़ी कंपनियों द्वारा खनन करके निकाल ली जाएगी । लेकिन यहाँ के मिट्टी की रक्षा, सुरक्षा और जतन किया जाए तो यह युगानुयुग यहाँ के निवासियों के स्वास्थ्य की रक्षा करेगी ।

यहाँ की मिट्टी को बचाने का उपाय क्या है:- छोटानागपुर सहित पूरी दुनिया में प्राचीन काल से ही जैविक खेती-बारी की जाती रही है । लेकिन बढ़ती आबादी के कारण अधिक अन्न उपजाने के लिए अविष्कार और विकसित किए जानेे वाले रासायनिक खाद और जहरीले कीट नाशक धरती की उर्वरता को ही निगल जा रही है, और यह आज किसानों को एक ऐसी चक्र में फांस चुकी है जिससे निकलने के लिए पूरी दुनिया में कोशिशे जारी है । रासायनिक खाद बनाने और बेचने वाले उद्योग रोज इसके गुणवत्त का बखान करती है, लेकिन यह न सिर्फ खेतों को अनुपजाऊ बना रही है, बल्कि प्राकृतिक रूप से मिट्टी में पाए जाने वाले तत्वों को नष्ट कर रही है और इस रासायनिक खाद से उपजा अन्न पूरी आबादी को प्रभावित कर रहा है । यही कारण है कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक पश्चिमी देश आज रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों से परहेज कर रहे हैं और जैविक अर्थात् आॅर्गानिक खेती की ओर रूख कर रहे हैं । आॅर्गानिक खेती-बारी की पद्धति न सिर्फ मिट्टी के प्राकृतिक तत्वों को बचा कर रखती है, बल्कि यह जल, वायु तथा वातावरण को भी प्रदूषितरहित रखती है । यह प्राकृतिक चक्र अर्थात् इकाॅलाॅजी सिस्टम को भी बचाए रखती है । यह प्राचीन काल से मानव और प्राकृतिक के बीच स्थिर संतुलन और संबंध को नष्ट नहीं करती है ।

शहरों के बाज़ारों में आजकल जैविक अन्न अर्थात् आॅर्गेनिक फूड की बहुत मांग है और यह सामान्य खाद्य पदार्थों से दुगुणे दाम पर बिकता है । विदेशों में आज कल इसी खेती पद्धति की धूम मची हुई है । उच्च आय वर्ग के ग्राहक सिर्फ आॅर्गेनिक फूड ही खरीदना पसंद करते हैं, क्योंकि ये जहरीले रासायनिक खाद और कीटनाशक रहित होते है और स्वादिष्ट तथा स्वास्थ्यकर होते हैं । छोटानागपुर की मिट्टी जैसी मिट्टी दुनिया में बहुत कम हैं । यह आॅर्गेनिक खेती के लिए सर्वोत्त्म है । यही कारण है कि कुछ बाहरी कंपनियाँ यहाँ भूमि लेने के फिराक में रहती हैं । एक तो मिट्टी अनमोल ऊपर से क्या पता उस मिट्टी के नीचे सोना या हीरा भरा पड़ा हो । छोटानागपुर के किसान सिर्फ आॅर्गेनिक खेती करके ही मालामाल हो सकते हैं और यह अंतहीन उच्च आय का साधन बन सकता है । लेकिन इसके लिए किसानों को संगठित रूप से कार्य करना होगा । उन्हें व्यक्तिगत खेती-बारी से ऊपर उठ कर सामूहिक, संगठित और नियोजित तरीके से खेती-बारी करना होगा । आदिवासी कृषि काॅआॅपरेटिव इस तरह के कार्य बखुबी कर सकता है । संगठित होने पर ही इसके मार्केटिंग व्यय को उठाया जा सकता है । छोटानागपुर में इसकी मिट्टी ही सबसे बड़ा खजाना है और यह खजाना हर खजाने से बड़ा है । बस मिट्टी पर नजरें गड़ाकर इसे प्यार से हासिल करना होगा । This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 18, 2016. All rights reserved