झारखण्ड का सबसे बड़ा ख़जाना

​                                                                                                                                                                                       नेह अर्जुन इंदवार

​सन् 2001 की बात है ।

मैं अपने भुवनेश्वर के अपने  मित्र जमादार गोडसोरा के साथ सुबह 4 बजे भुवनेश्वर से राँची जाने के लिए मोटरबाइक से निकला । हम किसी विशेष काम से नहीं निकले थे, बल्कि बाइक से रास्ते के आदिवासी गाँवों में जाकर वहाँ के लोगों से मिलना जुलना और बात करना चाहते थे । दोनों शहरों के बीच की 400 किलोमीटर की दूरी बाइक सवारी के लिए वाकई काफी लम्बी है । लेकिन हमारी मंजिल थी राँची ।

हम बहुत जोशिले और उत्साहित थे । कई वर्षो के बाद राँची जाना जा रहा था । दोस्तों से मिलने की खुशी और रास्ते के आदिवासी गाँवों में जाकर लोगों से खूब बातें करने की चाहत । करीबन 100 किलोमीटर जाने के बाद ही बडे़ आदिवासी गाँव दिखाई देने लगे । हम खेतों में काम करते लोगों के पास जाते और गोडसोरा ”हो“ में बात करते । और मुझे हिन्दी में बताते । चूंकि गाँववाले हिन्दी बोल व समझ नहीं पा रहे थे । मैं हिन्दी में बोलता और वह अनुवाद करके किसानों को ”हो“ में बताते ।

दशकों बाद किसानों से बातें हो रही थी । एक जगह कई महिलाएँ डियेंग (हँडिया) बेच रही थी । हम उनके पास गए और उनसे काम, घर परिवार और डियेंग बेचने के बारे बात करने लगे । वे अपने खेती-बारी, खेत-खलिहान और घर-परिवार की बातें बता रही थीं और मैं एक डायरी में नोट कर रहा था । उनके जीवन संघर्ष की बातें, पिछले कई दशकों में गाँवों में आए परिवर्तन को हम करीब से जान रहे थे ।

हम भुवनेश्वर जैसे दूर के शहर से आ रहे हैं यह जानकर वे हमारी थकावट को दूर करने के लिए डियेंग  पीने का अनुरोध किए । हमने मुस्कराकर कर धन्यवाद दिया कि अभी हमें बाईक से सफर करनी है डियेंग हमारे लिए भारी हो जाएगा । यह डियेंग चावल को पूरी तरह से मथ कर बनाया जाता है और उसमें चावल का अंश होता है । डियेंग पीने से पेट भर जाता है, इसका नशा बहुत असरदार होता है । अभी हम रास्ते के क्योंझर शहर नहीं पहुँचे थे और एक जंगल से गुजर रहे थे तभी एक कील बाइक के अगले पहिये में घुस गया । अब हमारे पास पैदल चलने के सिवा कोई चारा नहीं था । पठारी ऊँचाई पर धकेल कर बाइक ले जाना काफी थकावट भरा काम होता है । हम थक कर लतपत हो चुके थे । हम गुजरते ट्रकों से लिफ्ट मांगते लेकिन माल लदा ट्रक नहीं रूकता । बहुत चेष्टा के बाद एक खाली ट्रक आया और हम अपनी हीरोहोंडा उसमें लादने में कामयाब हो गए और क्योंझर आ गए । वहाँ पंक्चर ठीक किए और आगे बढ़ गए । लेकिन शहर से निकलने के बाद ही पेट में चूहे दौड़ने लगे । दोपहर के तीन बज चुके थे, पंक्चर के चक्कर में हम कुछ खाना ही भूल गए थे । हम कई ढाबों में गए लेकिन वहाँ की गंदगी और भिनभिनाती मक्खियाँ देखते ही मैं वहाँ खाने से इंकार कर देता । हमने बिस्कुट से काम चला लिया ।

हम झारखण्ड की सीमा में दाखिल हो चुके थे । झारखण्ड की मिट्टी को हमने माथे पर लगाया और प्रणाम किया । फिर हम आगे बढ़ गए । हम एक पेट्रोल पंप से पेट्रोल ले रहे थे तभी गोडसोरा का एक परिचित दिख गया । वह पास के एक गाँव से था । उसने अपने घर चलने का आमंत्रण दिया और हम उसके साथ हो लिए । उसने कहा खाना तो बन नहीं सकता है, लेकिन डियेंग मिल सकता है । हमने बिस्कुट खाया था इसलिए तुरंत कुछ खाने की आवश्यकता नहीं थी । परिचित जी ने हमें थोड़ा सा डियेंग का स्वाद लेने का अनुरोध किया । हमने थोड़ा सा डियेंग आलू के चखने के साथ लिया ।

चखना को चखने के बाद ही जैसे मुझ पर जादू सा छा गया । इतना स्वादिष्ट आलू ! मैं उनसे और आलू मांग-मांग कर लिया, पेट भरा होने पर भी काफी आलू खा गया । दिल्ली, मुंबई, हैदराबाद, भुवनेश्वर में मैंने वर्षो गुजारा है । हैदराबाद के आसपास के जिलों में हम बाइक से अक्सर घूमने जाते और वहीं तेलगु सीखने के लिए ग्रामीणों के घरों में खाना खा लेते थे । गुजरात के गाँवों में भी खुब घुमना हुआ है । महाराष्ट्र के अधिकतर जगहों पर जाना हुआ है । हर जगह के खास व्यंजनों को चखने का अवसर मिला है । लेकिन यहाँ तो आलू ने जैसे मंत्र ही मार दिया । आलू की वह सब्जी हमारे होस्ट ने कुछ मिनटों में जैसे-तैसे मर्दाना स्टाइल में सिर्फ डियेंग के साथ खाने के लिए बनाया था । पाक कला की कोई करामत नहीं अजमाई गई थी, न ही उसमें कोई मसाला डाला था सिर्फ हल्दी, नमक और मिर्ची से बना था वह नयाब सब्जी । 

मुझे एक ख़जाना मिल गया था । स्वादिष्ट आलू की वह एक प्रजाति है जो छोटानागपुर के गाँवों में ही मिलती है । दिन भर की थकावट छूमंतर हो चुकी थी । शायद यह डियेंग और उस जादुई आलू का असर था । हम पास के साप्ताहिक हाट में जा पहुँचे और वहाँ जाकर देखा जितना बड़ा हाट उतना बड़ा डियेंग का बाज़ार । लोग डियेंग के साथ अलग-अलग चखना खा रहे थे । हमने डियेंग का पैसा चुकाया लेकिन उसे पीने के लिए दूसरों को दे दिया और अलग-अलग सब्जी से बना चखना खाने लगे । वहाँ बेचे जा रहे चखना भी घर में बने आलू की तरह ही स्वादिष्ट थे । चखने का हर कौर हमारे लिए एक अनुभव था और हम उस अनुभव को ठूँसे जा रहे थे । जब हम हाट से निकले और काफी दूर चले गए तो पता चला, चखना खाने के रौ में मैं अपना डायरी वहीं भूल आया । मैंने जोर का ठहाका लगाया । गोडसोरा चौंक कर मुझे देखने लगा ।
क्या हो गया ?
लेकिन असली डायरी तो मैं साथ लेकर आया हूँ । मैंने अपना जीभ उन्हें दिखाया । वह भी जोरदार ठहाके लगाने लगा । अब हम दोनों फिल्म शोले के जय और बीरू की तरह बाइक में गाना गाते हुए चलने लगे ।

पहली मई 2014 को संजय पहान की शादी में शरीक होने के लिए फिर से राँची जाना हुआ और कोलकाता वापसी से पहले मटिल दीदी को ढेर सारा सब्जी बाजार से खरीदवा लिया । कोलकाता आकर सबसे पहले बेंग साग की सब्जी बनवाया । वाह ! क्या स्वाद है । मेरे मुँह से निकला । सभी ने जी भर का बेंग साग का लुफ्त उठाया । वाकई में बहुत स्वादिष्ट था साग । डुवार्स में हम अक्सर बेंग साग खाते रहते हैं लेकिन छोटानागपुरी बेंग साग का स्वाद कमाल का था । हफ्ते भर राँची से लाई गई दूसरी सब्जियाँ भी बनती रही । कोई दिल को उसी तरह बाग-बाग करता रहा और कोई कोलकाता में मिलने वाली सब्जियों की तरह ही साधारण स्वाद वाली थी ।

एक ही हाट, बाज़ार में मिलने वाली सब्जियों के स्वाद में इतना फर्क क्यों होता है ? इसका मुख्य कारण खेत में उपयोग किया जाने वाला खाद है । बेंग साग उपजाने के लिए किसी खाद की जरूरत नहीं होती है, वह प्राकृतिक तरीके से उगती है, जबकि दूसरे सब्जियों के मामले में अधिक उपज के लिए किसान रासायनिक खाद अर्थात् फार्टिलाइजर आदि का उपयोग करता है । रासायनिक खाद उपज बढ़ाने में मदद तो करता है लेकिन वह जमीन के औषधीय और प्राकृतिक गुण को खत्म कर देता है । यह प्राचीन काल से विकसित हो रहे अन्न में उपस्थित गुणों के तत्वों में बदलाव कर देता है ।

हर जगह की धरती के ऊपरी परत की मिट्टी अलग-अलग होती है । उस मिट्टी में अलग-अलग वनस्पति उगते हैं, पनपते हैं और हर जगह के वनस्पति में उस जगह विशेष की मिट्टी की सुगंध और औषधीय गुण रची बसी होती है । यही अन्न उस खास जगह के मनुष्य के लिए स्वास्थ्यकर होता है और वह कालांतर में उस जगह के निवासियों के लिए औषधि का काम करता है । प्राचीन काल से छोटानागपुर की धरती पर रहने वाले आदिवासी यहाँ के एक-एक कण, एक-एक पत्ते से परिचित हैं और वे यहाँ की धरती पर हमेशा खुशहाल, चैनशील और स्वस्थ रहे हैं । सौ-सौ साल तक मजबूत और स्वस्थ रहने वाले आजा, नाना की यादें अभी भी ताजी है । टाना भगत आंदोलन के दौरान नगर ठिठाईटांगर के फागू भगत, अघनु भगत टैक्स के बारे जानने के लिए राँची के कलेक्टर से मिलने के लिए सिसई से पैदल आए थे । वे कई दिनों तक रोज कलेक्टरेट जाते और कलेक्टर से बातें करने का अनुरोध करते, लेकिन कलेक्टर ने उनकी ओर आँख उठा कर भी देखने की जहमत नहीं उठाई । नाराज़ होकर फागू भगत ने ‘‘कलेक्टर साहेब हमसे बात कीजिए’’ कहते हुए आॅफिस में प्रवेश करते ही कलेक्टर की बाँह पकड़ ली । उनके बाॅडीगार्डस् फागू भगत के हाथों के बंधन छुड़ाने के लिए पूरा जोर लगा दिए, लेकिन छुड़ा नहीं पाए । डर के मारे कलेक्टर ने उससे बात करना स्वीकार किया और तुरंत टाना भगतों के खेतों के लगान को माफ करने की घोषणा कर डाली । यह किस्सा हम फागू भगत जिन्हें हम आजा कहते थे के जुब़ान से ही सुने थे, तब उनकी उम्र एक सौ दस वर्ष थी और तब भी वह अपनी चार वर्षीया नातीनी मनीर को गोदी लेकर गाँव की सैर करते थे ।

तब उनके जैसे न जाने कितने आजा और नाना लम्बी उम्र के साथ-साथ स्वस्थ शरीर के भी मालिक होते थे और जिंदगी का भरपूर आनंद लेते थे । यह स्वास्थ्य इक्का-दुक्का व्यक्तियों की नहीं हुआ करती थी, बल्कि समाज की नब्बे प्रतिशत से अधिक आबादी ऐसे ही स्वास्थ्य का आनंद उठाती थी । सुबह की प्रथम लाली के साथ ही बिस्तर से उठ जाना, दिन भर जी-तोड़ शारीरिक मेहनत करना और छोटानागपुर के मिट्टी पर उपजे साधारण, लेकिन प्राकृतिक स्वाद और गुणों से लबालब अन्न खाना और शाम ढलते ही अखरा में गीत-नृत्य में तल्लीन हो जाना । यही दिनचर्या था आदिवासियों के पुरखों का । कहीं कोई अस्पताल, चिकित्सालय नहीं था । जो भी था वह था होड़ोपैथी, जो आदिवासियों के परंपारिक ज्ञान पर आधारित था । यह ज्ञान भी अधिकतर छोटानागपुर की वादियों में मिलने वाली वनस्पतियों पर ही आधारित था । और यह वनस्पति छोटानागपुर की मिट्टी की पैदाइश होती थी । बात आती है यहाँ की मिट्टी की । यह मिट्टी ही यहाँ के वनस्पति, अन्न को दुनिया का बेहद स्वादिष्ट और स्वास्थ्यकर वनस्पति, अन्न बनाता है ।

लेकिन आधुनिकता का अंधानुकरण किए जाने के कारण छोटानागपुर की प्राचीन मिट्टी की गुणवत्ता खत्म होते जा रही है । खेतों को जोत कर व्यवस्थित ढंग से उगाए जाने वाले फसल के लिए रासायनिक खाद का प्रयोग करने के कारण यहाँ की मिट्टी की उर्वरता और स्वास्थ्यकर प्राकृतिक गुण समाप्त होने को है । साग-सब्जियों, मोटे चावल-दाल आदि के खेती के लिए किसानों द्वारा उपयोग किए जा रहे रासायनिक खाद पर उपयोग संबंधी कोई नियंत्रण नहीं है । यह यहाँ की जादुई मिट्टी पर भी बेरोक-टोक, अंधाधुंध प्रयोग किया जा रहा है । समाज में इस विषय पर कोई पहल नहीं की गई है । जहाँ कहीं रासायनिक खाद का प्रयोग नहीं हुआ है वह मिट्टी और उस पर उपजे वनस्पति की गुणवत्ता, स्वाद और नस्ल बची हुई है । यही कारण है कि बेंग साग अत्यंत स्वादिष्ट लगता है, लेकिन सभी सब्जी दिल को जीत नहीं पाते हैं ।

यह एक अत्यंत गंभीर और महत्वपूर्ण विषय है, जिस पर समाज और सरकार को तुरंत कदम उठाने की जरूरत है । छोटानागपुर के गर्भ में अनेक खनिज पदार्थ पाए जाते हैं, जो कालांतर में सरकार और बड़ी कंपनियों द्वारा खनन करके निकाल ली जाएगी । लेकिन यहाँ के मिट्टी की रक्षा, सुरक्षा और जतन किया जाए तो यह युगानुयुग यहाँ के निवासियों के स्वास्थ्य की रक्षा करेगी ।

यहाँ की मिट्टी को बचाने का उपाय क्या है:- छोटानागपुर सहित पूरी दुनिया में प्राचीन काल से ही जैविक खेती-बारी की जाती रही है । लेकिन बढ़ती आबादी के कारण अधिक अन्न उपजाने के लिए अविष्कार और विकसित किए जानेे वाले रासायनिक खाद और जहरीले कीट नाशक धरती की उर्वरता को ही निगल जा रही है, और यह आज किसानों को एक ऐसी चक्र में फांस चुकी है जिससे निकलने के लिए पूरी दुनिया में कोशिशे जारी है । रासायनिक खाद बनाने और बेचने वाले उद्योग रोज इसके गुणवत्त का बखान करती है, लेकिन यह न सिर्फ खेतों को अनुपजाऊ बना रही है, बल्कि प्राकृतिक रूप से मिट्टी में पाए जाने वाले तत्वों को नष्ट कर रही है और इस रासायनिक खाद से उपजा अन्न पूरी आबादी को प्रभावित कर रहा है । यही कारण है कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक पश्चिमी देश आज रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों से परहेज कर रहे हैं और जैविक अर्थात् आॅर्गानिक खेती की ओर रूख कर रहे हैं । आॅर्गानिक खेती-बारी की पद्धति न सिर्फ मिट्टी के प्राकृतिक तत्वों को बचा कर रखती है, बल्कि यह जल, वायु तथा वातावरण को भी प्रदूषितरहित रखती है । यह प्राकृतिक चक्र अर्थात् इकाॅलाॅजी सिस्टम को भी बचाए रखती है । यह प्राचीन काल से मानव और प्राकृतिक के बीच स्थिर संतुलन और संबंध को नष्ट नहीं करती है ।

शहरों के बाज़ारों में आजकल जैविक अन्न अर्थात् आॅर्गेनिक फूड की बहुत मांग है और यह सामान्य खाद्य पदार्थों से दुगुणे दाम पर बिकता है । विदेशों में आज कल इसी खेती पद्धति की धूम मची हुई है । उच्च आय वर्ग के ग्राहक सिर्फ आॅर्गेनिक फूड ही खरीदना पसंद करते हैं, क्योंकि ये जहरीले रासायनिक खाद और कीटनाशक रहित होते है और स्वादिष्ट तथा स्वास्थ्यकर होते हैं । छोटानागपुर की मिट्टी जैसी मिट्टी दुनिया में बहुत कम हैं । यह आॅर्गेनिक खेती के लिए सर्वोत्त्म है । यही कारण है कि कुछ बाहरी कंपनियाँ यहाँ भूमि लेने के फिराक में रहती हैं । एक तो मिट्टी अनमोल ऊपर से क्या पता उस मिट्टी के नीचे सोना या हीरा भरा पड़ा हो । छोटानागपुर के किसान सिर्फ आॅर्गेनिक खेती करके ही मालामाल हो सकते हैं और यह अंतहीन उच्च आय का साधन बन सकता है । लेकिन इसके लिए किसानों को संगठित रूप से कार्य करना होगा । उन्हें व्यक्तिगत खेती-बारी से ऊपर उठ कर सामूहिक, संगठित और नियोजित तरीके से खेती-बारी करना होगा । आदिवासी कृषि काॅआॅपरेटिव इस तरह के कार्य बखुबी कर सकता है । संगठित होने पर ही इसके मार्केटिंग व्यय को उठाया जा सकता है । छोटानागपुर में इसकी मिट्टी ही सबसे बड़ा खजाना है और यह खजाना हर खजाने से बड़ा है । बस मिट्टी पर नजरें गड़ाकर इसे प्यार से हासिल करना होगा । This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 18, 2016. All rights reserved

हाथी और आदिवासी गति

                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             नेह अर्जुन इंदवार    
डुवार्स की वादियों में मानव और जंगली जानवरों के बीच कई दशकों से मुठभेड जारी है। हर सप्‍ताह कहीं न कहीं कोई अभागा जानवरों के हमलों से मारा जा रहा है। कहीं जंगली हाथियों का झूंड गॉव में हमला कर रहा है, तो कहीं अपने दैनिक कार्यों में मग्‍न लोगों पर जानवरों के हमले हो रहे हैं। इसी कड़ी में कुछ दिन पहले हुई मुठभेड भी शामिल है, जिसमें एक दांतिला हाथी ने डुवार्स के नगराकाटा–चालसा जंगल में एक ट्रेन को रोक लिया था और गुस्‍से में ट्रेन की ओर बढते हाथी से बचने के लिए ट्रेन के ड्राइवर ने ट्रेन को बैकगीयर में डालकर पीछे सरका लिया था।

इसी रूट में कुछ दिन पहले एक बार दो हाथी और दूसरी बार सात हाथी ट्रेन से टकरा कर मारे गए। आमतौर से इसे एक सामान्य घटना मान लिया गया है, कि ट्रेन पटरी पार करते हुए ये हाथी मारे गए। हाथी को तुलनात्‍मक रूप से एक बुद्धिमान जानवर माना गया है। सामान्‍य परिस्थितयों में पत्तियों को खाकर पेट भरने वाले शाकाहारी हाथी अन्‍य जानवर अथवा प्राणी पर हमला नहीं करते। लेकिन पिछले एक दशक से डुवार्स के जंगलों के हाथी हिंसक हो गए हैं और अक्‍सर जानमाल की खबरें मिलती रहती है।

चाय उद्योगतंत्र के अधीन चाय की खेती के लिए आदिवासियों ने उन्‍नीसवीं सदी में डुवार्स–तराई के विशाल भूभाग में फैले घने जंगल को काटा और साफ किया। साफ किए गए इन्‍हीं हजारों वर्गमील क्षेत्र में अंग्रेज और भारतीय उद्योगपतियों ने सैकडों चाय बागान बनाया। बीसवीं सदी के पाँचवे दशक तक भी जलपाईगुड़ी जिले के विभिन्‍न भागों में बड़े और घने जंगल बचे हुए थे। यद्यपि जिले के डुवार्स इलाके में अनेक चाय बागान बस चुके थे, लेकिन जंगली जानवरों के लिए पर्याप्‍त जगह छोड़ी गई थी और जानवरों का आबादी के क्षेत्र में विचरण करने के कुछ ही विवरण मिलते हैं। जंगली हाथी कभी–कभी बागान बस्तियों में निकल आते थे, लेकिन जानमाल की हानि नहीं करते थे। मांदर, नगाडे और ढोलक बजाने और इंसानों की अजीब कोलाहल सुनकर जंगलों की ओर भाग जाते थे। केले के बागान और धान के खेत उनके प्रिय जगहें होतीं थीं।

सत्‍तर अस्‍सी के दशक में जब हम छोटे थे और रात को शोर सुनते थे कि गॉंव में हाथी आया है, तो हम भी अंधेरे में भाग कर हाथी देखने के लिए दौड़े जाते थे। हमारे लिए हाथी भगाना एक आनंददायक मौका होता था और हम हाथियों के बिल्‍कुल करीब जाकर उन्‍हें ‘’भगाने’’ का आनंद लिया करते थे। हमें इस बात का डर नहीं होता था कि विशालकाय जानवर गुस्‍से में पीछे मुडकर हमें कहीं रौंद न दे। तब हाथी हिंसक नहीं होते थे, वे हमारे शोर से कभी–कभार ही बिलचित होकर दो चार कदम भागते थे, नहीं तो अक्‍सर अपनी शानदार मस्‍त चाल से ही चल कर जंगल की ओर चले जाते थे।
मैं तब ग्‍यारह साल का था। असम से हाथी शावक पकड़ने के लिए महावतों का एक दल अपने पालतु हाथियों के साथ हमारे बागान आया हुआ था। एक सुबह किसी ने बताया कि हाथी शावक को पकड़ने के लिए महावतागण अपने हाथियों के साथ जंगल की ओर गए हैं। मैं भी अपने फुफेरे भाई शंकर तिर्की के साथ उनके साथ जाना चाहता था। सुबह हम उनके ठहरने के स्थान पहुँचे तो पता चला वे तो भोर को ही जंगल के लिए निकल चुके हैं।   उनके अलसुबह ही चले जाने पर हमें निराशा हुई, लेकिन हम हार नहीं मानने वाले थे। जिद्दी बच्चे थे और आव देखा न ताव गाना गाते हुए एक दूसरे के कंधे पर हाथ रखकर जंगल की ओर चल पडे। अभी जंगल में कुछ ही दूर गए थे कि झरने (पझरा) के पानी से बना छोटा सा वन्‍य तालाब साफ दिखाई देने के बदले भरपूर मटमैला दिखाई दिया। हमें लगा हाथियों का झूँड यहॉं से नहा कर जंगल के अंत:भाग में चला गया है। हम गाना गाते हुए बीस पच्‍चीस कदम आगे ही बढ़े थे, कि हमारे बाऍं ओर का एक झाडी लरज कर नीचे गिर गया। हम उस झाडी को ध्‍यान से देख पाते उससे पहले ही दाऍं ओर का एक झाडी भी उसी अंदाज से हिल गया। हम एक सेकेंड के सौंवे भाग में ही देख चुके थे कि हमारे दोनों ओर हाथियों का झूँड बैठा हुआ है। हाथियों के झूँड को देखकर हमारे गाने तो बंद हो ही चुके थे, होश भी ठिकाने आ चुके थे। कहॉं तो हम हाथियों को पकड़ कर उनकी सवारी करने के ख्‍वाब लिए जंगल आए थे और अब तो हमें एक पल में जिन्‍दगी के यथार्थ समझ में आ गया था। एक क्षण के लिए तो ऐसा लगा भागना बेकार का प्रयास होगा, अब चल कर हाथियों के हाथों ही वीरगति को प्राप्‍त कर लेते हैं। लेकिन दिमाग के किसी कोने ने भागने का आदेश दिया और हम सिर पर पॉंव रख कर ऐसे भागे कि यदि ओलंपिक की दौड़ में होते तो प्रथम ही आते। आज कहना चाहूँगा कि यदि हाथी जरा भी हिंसक होते तो उस दिन हम किसी भी तरह से बच नहीं पाते। हाथियों का झूँड हमारे रास्‍ते के दोनों ओर बीस पच्‍चीस गज की दूरी पर पझरा के पानी में स्‍नान करके आराम फरमा रहे थे। वह दृष्‍य किसी फिल्‍मी बैकग्राउण्‍ड दृश्‍य की तरह आज भी नजरों से अक्‍सर गुजरती है।

आज डुवार्स के जंगल में पेड ऐसे काटे जा रहे हैं, जैसे किसानों के द्वारा अपने बैलों को खिलाने के लिए रोज घास काटी जाती है। जंगली सूअर, सियार, हिरण, खरगोश, जंगली भैंस, चीता आदि अक्‍सर ही जंगल में सूखी लकडियॉं इकट्ठा करते झारखण्डी, राभा, बोडो और गोर्खा महिलाओं और पुरूषों को दिखाई देते रहते थे। क्‍योंकि जंगलों में इन समुदायों की महिलाऍं ही वनोपज के लिए रोज ही जंगलों की खाक छानती थीं। लेकिन लकड़ी चोर और लकड़ी तस्‍करी में लगे लोगों ने अब जंगल को उजाड़ कर रख दिया है। अब जानवर तो जंगलों में दिखाई ही देने बंद हो गए हैं। कुछ जानवर नेशनल पार्क में तब्दील जलदापाडा, गोरूमारा, चिलापाता, जंयती, राजाभातखावा आदि जंगलों में बचे रह गए हैं, लेकिन दौलत के भूखे शहरी सुटेटबुटेट जानवर उन्‍हें भी खत्‍म करने के लिए दिन रात षड़यंत्र रचने में अपनी उर्जा व्‍यय कर रहे हैं। आजकल मैना, गोरैया, पांडुकी आदि भी बहुत कम मात्रा में दिखाई देती हैं। मोर की चिंहूक की आवाज तो जंगलों में शायद ही सुनाई देती है।

डुवार्स में आज जनसंख्‍या बेतहासा बढ़ चुकी है। मानवीय कार्यकलापों से इकोलॉजी में बहुत अंतर आ चुका है। कभी थोड़ी सी बारिश होने पर जंगलों में पझरा फूटता था। जंगल किनारे हम मिट्टी को काट कर एक दो फूट के नन्‍हें तालाब बना कर पझरा पानी को इकट्ठा करके ‘’मेरा तालाब -तेरा तालाब’’ खेलते थे। जंगल के काफी अंदर जाकर हम पेड़ पर चढ़ कर जानवरों की आवाजों की नकल निकालते थे और जानवरों से ऑंखमिचौली खेलने की कोशिश करते थे। हमें जंगली जानवरों का भय नहीं सताता था। हम उन्‍हें शर्मिले ही समझते थे और साथ में एक लाठी अथवा डालियॉं काटने के लिए एक झोरनी (लम्‍बा छूरा) ही साथ रखते थे। कभी–कभी हम मीलों तक जंगल में सैर करते थे। हमारी सुरक्षा हमारे सादरी और हिन्‍दी फिल्‍मी गाने किया करते थे, जिसे हम जंगल दौरे पर पंचम स्‍वर में गाते थे। जंगली जानवरों के कान और ऑंखें बहुत तेज होती हैं, वे हमारी आवाज सुन कर ही घनी झाडियों में दुबक जाते थे। जंगल  में उनके खाने पीने की चीजों की कमी नहीं थी। आदमी पर हमले सिर्फ बाघ ही किया करते थे वह भी आदमी के द्वारा उन्‍हें नुकसान पहुँचाने के इरादे से हमले किए जाने पर।

कभी शांत रहने वाले जंगली पशु आज मानवीय स्‍वार्थपूर्ण गतिविधियों के कारण त्रस्‍त हैं। अपनी स्‍वार्थ की पूर्ति के लिए मानवों ने वन्‍य प्राणियों के प्राकृतिक अधिकारों पर निरंतर हमला बोला है और इसी मानवीय हमलों से अजीज आ चुके वन्‍य प्राणी आज मनुष्‍य के प्रति हिंसक भावना विकसित कर चुके हैं। कभी आदमी को देखकर झाडियों और जंगलों में छुप जाने वाले शर्मिले जानवर आज आदमी को देखते ही उनपर हमला बोलने लगे हैं। चूँकि जानवर मानव की तरह तीक्ष्‍ण बुद्धि के नहीं होते हैं और मानव के तकनीकी शक्तियों को समझ नहीं पाते हैं, इसी कारण वे इस पृथ्‍वी से मानव के द्वारा मिटाए जा रहे हैं।

बहुत कुछ ऐसा ही अशिक्षित और भोले–भाले होने के कारण आदिवासियों के साथ भी घट रहा है। उनके खेत खलिहान लूटे जा रहे हैं, उन्‍हें उनके ही घरों के आसपास के मामूली नौ‍करियों जैसे आंगनवाड़ी–रसोईया और शिशु शिक्षक जैसे रोजगारों से भी वंचित किया जा रहा है। कभी डुवार्स के अस्‍सी प्रतिशत खेल खलिहानों को जोतने वाले आदिवासी आज अपने अधिकांश खेत खलिहानों से हाथ धो बैठे हैं। देश के दूसरे राज्‍यों और पडोसी देशों से आए हुए नवआगंतुकों ने छल–कपट से आदिवासियों के खेत–खलिहानों को एक बार लूटना शुरू किए तो बस लूटते ही चले गए। वे ऐसे आदिवासियों को चुनते हैं, जिनके पास प्रयाप्त भूमि होती है और जो नशापान करना भी पसंद करते हैं। उनसे दोस्ती करके उन्हें नियमित नशापान कराया जाता है। फिर उनके चारित्रिक पसंद को जानकर उन्हें अन्य ऐब का भी शौकिन बनाया जाता है। पहले उन्हें नशेड़ी और फिर कर्जदार बनाया जाता है। इन्हीं तिकड़मों के सहारे आज भी रोज कहीं न कहीं खेत खलिहान लूटे जा रहे हैं। आदिवासियों के खेतों को कहीं ट्राइबल लैंड के नाम पर पहाडी ट्राइबल के नाम पर स्‍थानांतरित किए जा रहे हैं तो कहीं ट्राइबल डिपाटर्मेंट के सहयोग से ननट्राइबल में बदला जा रहा है। अनेक खेत–खलिहान आज भी कागजों में ट्राइबल के नाम पर ही हैं, लेकिन उस पर कब्‍जा किन्‍हीं गैर आदिवासी का है।

अनपढ़ आदिवासी, सरकारी और तथाकथित ‘’आदिवासी चिंतकों’’ के सह और सहयोग से किए जा रहे इस अन्‍याय और चालाकी के खेल को उस वन्‍य प्राणी की तरह असहाय होकर देख रहा है, जो अधिक बलशाली होने के बावजूद मानवीय तकनीकी को समझ नहीं पाने के कारण अपना अस्त्वि गँवाते जा रहे हैं। आम आदिवासी को जमीन स्थानानंतण के कानून की जानकारी नहीं है। जिन्हें थोड़ी बहुत जानकारी है, उन्हें सरकारी नियमों के दावपेंच की जानकारी नहीं है। जैसे वन्य प्राणी अपने जीने खाने के सिवा और कोई चालाकी सीख नहीं पाते हैं, वैसे ही आदिवासी भी राज्य के कानूनी दॉंवपेंच और दूसरों के चालाकी को समझ नहीं पाते हैं।

आज डुवार्स के वन्‍य प्राणी खूँखार होकर जंगल में पेट न भर पाने के कारण मानव बस्तियों में घुसे जा रहे हैं और मानव से मुठभेट होने पर उन पर हमला कर रहे हैं। सरकार इन हमलों में घायल होने वाले को कुछ आर्थिक मदद देकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर रही है। शरीर की गंभीर व्‍याधि का इलाज करने के बदले चेहरे पर टेल्‍कम पावडर लगा कर चेहरे पर लाली लाने की इन कोशिशों से स्थि‍ति में कोई सुधार नहीं होगा और यह मर्ज भविष्‍य में तीब्र गति से बढता ही रहेगा। गॉंव की गरीब जनता को पॉंच, दस, पचास या अधिकतम एक लाख रूपये देकर न तो वन्‍य प्राणी को वन से बाहर आने से रोका जा सकेगा और न ही गॉंव वालों को इन हमलों से सुरक्षा ही दी जा सकेगी।

वन्‍य प्राणियों की तरह ही आज डुवार्स–तराई के आदिवासी भी पक्षपात, अन्‍याय, चालाकी और अपने बापदादाओं के द्वारा छोडी गई एक मात्र जीविका के साधन खेत–खलिहानों की लूट और सरकारी दमन से अत्‍यंत क्षुब्‍ध और आक्रोशित है। आदिवासियों के सामाजिक और आर्थिक समस्‍याओं को भी सरकार टेल्‍कम पावडर लगाकर दर्द और व्‍यथा को छुपाने और नकली चमक दिखाने की भरपूर कोशिश कर रही है। आदिवासियों के रहमुनाई का दावा करने वाले नेतागण और कार्यकर्ता भी कास्मेटिक उपायों के पीछे अपनी उर्जा गँवा रहे हैं। सरकार भी उनकी कल्‍पनाशीलहीनता, दूरदृष्टिहीनता की सीमा को गहराई से जानती है और उन्‍हें इन्‍हीं सब बातों में उलझा कर रखती है, ताकि वे नई कल्‍पानाशीलता और दूरदृष्टि सम्‍पन्‍न होकर दूर की कोई कौड़ी न मांग लें।

डुवार्स के जंगलों में वास करने वाले वन्‍य प्राणियों के लिए सरकार के पास कोई पुख्‍ता परियोजना नहीं है, न ही वह इस समस्‍या को सुलझाने के लिए गंभीर है। इसी तरह वह आदिवासियों की समस्‍याओं को भी सुलझाने में गंभीर नहीं है। सरकार की उदासीनता, जानबुझकर समस्‍याओं को न सुलझाने की नीयत की दोहरी मार आदिवासी समाज को पड़ रही है। आदिवासियों के हाथों बचे थोड़े से खेतों में लहलहाते धान को खाने के लिए हाथी रात में चले आते हैं। खेत के धान, सब्‍जी बारी के केले खाने के साथ साथ हाथी थोडा मस्‍त होने के लिए हँडिया की गंध सूंघ कर आदिवासी गॉंवों की ओर चल पड़ते हैं। कच्‍चे मकानों को रौंद डालते हैं और सामने आने वाले मनुष्‍य को भी देखते ही अपने रोष की भावना को व्‍यक्‍त कर डालते हैं। हाथियों के गुस्से से शिकार हुए लोगों की गणना की जाए तो उनमें आदिवासियों की संख्या ही अधिक होगी।

डुवार्स के आदिवासी एक ओर सरकारी सहमति से हो रही लूट, पक्षपात और अन्‍याय से जुझ रहे हैं, वहीं सरकारी सहमति से बसाए गए विशाल बाहरी जनसंख्‍या के कारण सिकुड़ते प्राकृतिक संसाधानों की कमी से जुझते वन्‍य प्राणियों के हमलों से भी त्रस्‍त हो रहे हैं। स्‍पष्‍ट रूप से दोहरी मार पड रही है समाज में।

सरकारी और संचार माध्‍यमों द्वारा यह कहा जा रहा है कि रेल पटरी पार करते हुए एक साथ सात हाथी ट्रेन के धक्‍के से मारे गए। लेकिन यह अर्द्धसत्‍य है। हाथियों के कान बहुत तेज होते हैं। मालगाडी की गड़गडाहट पॉंच किलोमीटर दूर से उन्‍हें सुनाई पड़ सकती है। विशाल ट्रेन को सामने से आते देखकर वह पटरी पार करने के लिए शायद ही तैयार होंगे। एक हाथी इसके कुछ दिनों पहले ही ट्रेन से मारा गया था, जिसे शायद दूसरे हाथी ने अपनी ऑंखों से देखा लिया था। उन्‍हें मानव के तकनीकी ज्ञान के बारे कुछ मालूम नहीं। लेकिन ट्रेन से अपने झूँड के साथी को मरते हुए देख कर इतना तो समझ आ ही गया होगा कि कोई तेज और विशालकाय ‘जानवर’ उन्‍हें मार डाला है। शायद उसी का बदला लेने के लिए वे मूक जानवर एक साथ ट्रेन से भिड़ गए और उन्‍हें अपनी जान गँवानी पडी। विशेषज्ञगण  शायद इन बातों को समझते भी होंगे। कभी अहिंसक रहे जानवर आज कितने हिंसक हो चुके हैं, इस घटना से सहज ही पता चल जाता है।

आदिवासी समाज एक शांतिप्रिय समाज है। सामुहिकता की उनकी भावना में सभी के लिए जगह और भावना है। इन ‘सभी’ में मनुष्‍य और प्राकृतिक दोनों ही शामिल हैं। लेकिन आज उनके साथ जो छल किया जा रहा है, उससे वह बहुत व्यथित है। यही व्यथा को कुछ तत्वों ने हिंसक मोड़ देने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ा है। डुवार्स और तराई में अभी भी आदिवासी शांत है। जरुरत इस बात की है कि उसके साथ हो रहे अन्याय, छल–कपट, पक्षपात, चालाकी को रोका जाए। देर होने पर शांत आदिवासी भी वन्य हाथियों की तरह हिंसक हो सकते हैं। देश के कई भागों में आदिवासियों को हिंसा की दीक्षा दी जा रही है। उनके हाथों में हाथियार थमाया जा रहा है। उन्हें विशाल हिंसक जानवर बनाकर देश को रौंदने का जरिया बनाया जा रहा है। यह निश्चय ही वेदनापूर्ण स्थिति है।

डुवार्स–तराई के सुरम्य वादियों में सिर्फ कुछ हाथी ही हिंसक हो चुके हैं। लेकिन जानमाल की हानि बहुत हो रही है। इस सुरम्य वादियों में हाथियों और आदिवासियों दोनों को ही शांतिपूर्ण जीवन जीने का प्राकृतिक और कानूनी अधिकार प्राप्त है। वे जीवन जीयें और शांत रहें, इसके लिए जरुरी है कि उनके अधिकारों और अस्तित्व का सम्मान किया जाए। यह अतिआवश्यक है कि देश और समाज द्वारा पूर्ण रुप से उनकी समस्या को सुलझाने के लिए ईमानदारीपूर्ण प्रयास किया जाए। हाथियों की तरह आदिवासियों का भी संयम जवाब दे दे तो वह निश्चच ही इऩ वादियों के लिए सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दिन होगा।