चमरा ऊराँव और आदिवासी परंपरा

                                                                                                                                                                                          नेह अर्जुन इंदवार 

           जंगली हाथियों ने चमरा उरॉंव का घर दो साल पहले ही उजाड दिया था । वे घर में रखे चावल दाल तथा अन्‍य खाद्यपदार्थ भी  खा गए। किसी तरह 65 वर्षीय वृ्द्ध चमरा उरॉंव ने भाग कर रात में अपनी जान बचायी थी। लेकिन दो वर्ष बीत जाने के बावजूद अभी तक उन्‍हें वन विभाग ने कोई क्षतिपूर्ति नहीं दी।

नियमानुसार वन विभाग ऐसे लोगों को तुरंत क्षतिपूर्ति देता है, जिन्‍हें जंगली हाथी नुकसान पहुँचाते हैं। अकेले जीवन गुजर बसर करने वाले गरीब चमरा पिछले दो वर्षों में अपने घर की मरम्‍मत नहीं करवा पाए हैं  और आज वे  भीषण सर्दी ठिठुरता हुआ रात काटते हैं। बीरपाड़ा के पास रंगालीबाजना, चापागुडी मौजा के डिपालाइन में रहने वाले श्री चमरा उरॉंव किसी तरह मजदूरी करके अपना पेट तो भर लेते हैं, लेकिन इतना पैसा नहीं बचा पाते हैं कि वे अपने मकान की मरम्‍मत करवा सकें। श्री चमरा उरॉंव के पास बीपीएल (बिलो पॉवर्टी लाइन) राशन कार्ड था जिसके आधार पर उसे सरकार से इंदिरा आवास के नाम पर एक रूम मिला हुआ था। लेकिन मकान बनने के दो महीने बाद ही हाथियों का झुंड गॉंव में आया और घरों को तहस नहस करके चला गया।

विगत दो वर्षो तक उन्‍हें क्‍यों क्षतिपूर्ति नहीं दी गई इस विषय पर वन विभाग के अधिकारी सुरंजन सरकार कहते हैं वे यहॉं नये आए हैं वे देखेंगे कि क्‍यों चमरा उरॉंव को क्षतिपूर्ति नहीं मिली। इस गाँव में रहने वाले अधिकतर रहीवासी आदिवासी हैं और मजदूरी करके जीवन निर्वाह करते हैं।

आदिवासी समाज बहुत बदल गया है। युग बीतने के साथ तो समाज बदलता ही है। लेकिन आदिवासी समाज में निरंतर हो रहे बदलाव प्राकृतिक और स्‍वभाविक बदलाव नहीं है। यह बदलाव देश में विकास के नाम पर हो रहे उथल-पथल का साइट इफेक्‍ट अधिक और समाज के द्वारा सहर्ष चुना गया कम है। आदिवासी समाज में व्‍यक्तिगत जीवन सुखमय जीवन का एक पहलू होता था। अर्थात व्‍यक्ति यदि सुखी है तो वह व्‍यक्तिगत जीवन में एकांतिक जीवन जी सकता था। लेकिन दुख में समाज हमेशा उसके दुख को बॉंटने के लिए तत्‍पर रहता था। समाज कौटोंबिक परिवारों में बॉंटा हुआ जरूर होता था लेकिन एकता और सामुहिकता की भावना उनमें स्‍वभाविक रूप से व्‍याप्‍त होती थी। चाहे फसल की कटाई हो चाहे फसल की बुआई। मदइत के सहारे पूरे गॉंव में हर तरह के पारिवारिक और सामाजिक कार्यो को सभी मिल कर पूरा कर लेते थे। बच्‍चों के पालन-पोषण और देखरेख अथवा युवक युवतियों के सामाजिक प्राशिक्षण की बातें हो, सभी मिल कर करते थे। किसी में यह भावना नहीं होती थी कि ये बच्‍चे फालना के हैं इसलिए हमें उसे नजरांदाज करने हैं। बडों की इज्‍जत गॉव समाज में सभी करते थे। एक बुजुर्ग सभी के बडा, आजा अथवा नाना होता था।
किसी  एक आदमी के बीमार पड़ने पर सभी उसके दावा दारू में भले व्‍यकितगत रूप से हाथ नहीं बटा रहे होते लेकिन परोक्ष रूप से सभी उसके लिए दुखी होते थे और उसके खेती बारी को बारी-बारी से मदद करके फसल उगाने में सहायता करते थे। किसी मजबूर आदमी की मजबूरी को समाज कभी भी न तो मजबूर आदमी की व्‍यक्तिगत मजबूरी समझता था न ही कभी उनकी मजबूरी का लाभ उठाने के लिए कोई नीचता के स्‍तर पर उतरता था। झारखण्‍ड के गॉंवों में गॉंव हमेशा स्‍वनिर्भर होते थे और बहुत कम चीजों के लिए वे गॉंव के बाहर निर्भर रहते थे। गॉंव बृहद रूप में एक परिवार ही होता था।

किन्‍तु आज गॉंव और समाज की बात छोड दीजिए आज तो परिवार में ही एकता की भावना नहीं होती है। व्‍यक्ति केि‍न्‍द्रत स्‍वार्थ आधारित व्‍यक्तिवाद ने आज पूरे आदिवासी समाज को अपने आगोश में ले लिया है। आज हर चीज के लिए आदिवासी समाज दूसरे समाज पर निर्भर है। क्‍योंकि साम्‍यवाद की भावना दिलों से खत्‍म होती जा रही है।  विकासवाद ने आदिवासी स्‍वनिर्भरता को खत्‍म कर दिया है और हम आज आदिवासीयत से दूर होते जा रहे हैं। आज समाज में लाखों चमरा उरॉंव हैं जिन्‍हें पढा-लिखा तबका जरा सी मदद पहॅुचा के उनके साधारण जीवन में सुख की दो घडी दे सकता है। लेकिन चमरा उरॉंवों को उनके आस पडोस में रहने वाले आदिवासी शिक्षित मदद पहुँचाने में तत्‍पर नहीं होते हैं और तमाम नियमों और कानूनों के बावजूद उन्‍हें सहज रूप से प्राप्‍त होने वाली सहायता नहीं पहॅुच पाती है।

शिक्षा से समाज में सुबह के उजाले की किरण की जगह दोपहरी की ऐसी किरणे मिल रही है जिनकी तपीश हमें जला रही है।रोज सुबह निकलने वाला सूरज हमेशा पुराना वाला सूरज नहीं होता है वह अपने साथ नयी रोशनी लेकर आता है। नयी सुबह की नई रोशनी से आदिवासी गॉंव भी अछूते नहीं रहे और गॉवों से ग्रामीण शहरों और कस्‍बों में जाने लगे और वहॉं से वापसी में वे अपने साथ कुछ रूपये पैसे और नये कपडे ही नहीं बल्कि नयी सोच, नयी विचारधारा, परंपरा और आचार-व्‍यवहार भी लाने लगे। सामूहिक जीवन पद्वति में जीवन जीने वाले आदिवासी कस्‍बों, शहरों और नगरों में जाकर व्‍यक्ति-केि‍न्‍द्रत, स्‍वकल्‍याण के विचारों से वाकिफ होने लगे,  उसे अपनाने लगे और इसे वे अपने गॉंवों में भी परांपरा की तरह सींचने लगे।


व्‍यक्ति-केि‍न्‍द्रत विचारधारा ने समाज को बुरी तरह से झकझोर दिया है। आज सामुहिकता की भावना की जगह व्‍यक्तिगत स्‍वार्थ की भावना ने ले लिया है। कभी छोटे-मोटे झगडे से लेकर बडी-बडी लडाईयों को गॉंव के पंचायत अथवा पडहा पंचायत आदि में सुलझाया जाता था, लेकिन आज मामूली कहासुनी भी पुलिस और कचहरी तक पहॅुचती है। शहरों में जा कर बस जाने वाले गॉंव वालों को भूलते जा रहे है। वहीं गॉंव वाले भी शहरों में बस जाने वालों के साथ न सिर्फ शहरी के रूप में ही व्‍यवहार करते हैं, बल्कि उन्‍हें खेती-बारी के हक से भी जुदा समझते हैं। पैसे आधारित सोच ने तमाम सामाजिक विचारों को स्‍वार्थ आधारित विचारों में बदल दिया है। आज कोई चमरा उरॉंव बुढापे में कष्‍ट का जीवन जीता है तो समाज में कहीं कोई हलचल नहीं मचता है। कोई पडोसी सामने आकर उन्‍हें न तो दिलासा दिलाता है न ही उन्‍हें अपनी सामर्थ्‍यता के अनुसार कोई मदद पहुँचाता है। जो पढे-लिखे हैं वे अपनी ही दुनिया में खोए हुए अपने जीवन स्‍तर  को और उँचा उठाने में व्‍यस्‍त हैं।

समाज को नेतृत्‍व देने का दावा करने वाले अपनी रूतबा को बढाने और अपने लक्ष्‍य को पाने में ही लगे हुए हैं।आदिवासी समाज भारत के अन्‍य सम-सामयिक समाजों में सिर्फ आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछडी हुआ है। सामाजिक रूप से आदिवासी समाज अभी भी अनेक समाजों से आगे और समृद्व है। अभी भी आदिवासी समाज में समाज की कीमत पर अपनी झोली भरने, अपने धनबल पर अन्‍याय और अनैतिक कार्य करने वालों को मान्‍यता नहीं मिलता है। न ही अन्‍य भारतीय समाजों में व्‍याप्‍त कुरीतियों को अपने समाज में स्‍थान देता है।

नारी जाति को आदिवासी समान में जितना सम्‍मान और अधिकार मिलता है उतना और कहीं भी नहीं। शादी में दहेज मांगने का साहस करने वाले उँगली में गिने जा सकते हैं। खेती की भूमि सामूहिक और सामाजिक मानी जाती है। जाति और धर्म के रूप में किसी भी व्‍यक्ति के साथ सामाजिक रूप से कोई भेदभाव नहीं किया जाता है। एक ही घर में एक भाई सरना और एक भाई ईसाई हो सकते हैं। वर्ग भेद न के बराबर है। चाहे कोई धार्मिक हो चाहे कोई अधार्मिक समाज इसकी कोई परवाह नहीं करता है। धार्मिक कटटरता  थोपने की तमाम कोशिशें बेकार हुई है। समाज को धार्मिक रूप से बॉंटने की कोशिशे भी सफल नहीं हुई है।

कुछ लोग आदिवासियों को दलितों से भी पिछडे और नीच साबित करने की बहुतेरे कोशिशें की लेकिन आदिवासी उच्‍च सामाजिक मूल्‍यों के कारण वे इस मामले में फिसडडी साबित हुए हैं। आदिवासी, समता स्‍वतंत्र और समरसता में प्राकृतिक रूप से विश्‍वास करता है। न तो किसी समाज को अपने से छोटा समझता है न ही किसी समाज को अपने से बडा। वर्तमान समय में जिन मूल्‍यों और विचारों को कानून और संविधान के द्वारा लोगों में प्रचारित किया जा रहा है वे तमाम बातें आदिवासी समाज में युगों से स्‍थापित हैं। चाहे वह पर्यावरण की बातें हो, प्रदुषण फैलाने की बाते हो या वह आदमी को अनचाहे आचार-व्‍यवहार और परांपराओं से बचाने की बातें हो। आदिवासी समाज हमेशा सर्वकल्‍याणकारी और सर्वजनहिताय बातों को ही अपने समाज में स्‍थान और मान्‍यता दिया है।

आदिवासी गॉंव जितने साफ-सुथरे और स्‍वच्‍छ होते हैं वैसे गॉंव भारत के और कौन से हिस्‍से में मिलते हैं इस बात की जानकारी पूरे भारत की यात्रा करने के बाद भी मुझे नहीं हुई। मेरे यह कहने से लोगों को आश्‍चर्य होता है कि आदिवासी परिवार तथाकथित ब्राहमण और  तथाकथित दलित को एक ही नजर से न सिर्फ देखता है, बल्कि समान रूप से व्‍यवहार भी करता है। सामाजिक रूप से न तो वह किसी व्‍यक्ति को जन्‍म के आधार पर छोटा समझता है न ही बडा।

भारतीय संविधान को लागू हुए साठ साल हो गए। तमाम कानूनी प्रावधानों के बावजूद लोगों की जातिवादी विचारों और परंपराओं में कोई परिवर्तन नहीं आया है। लेकिन आदिवासी समाज इन्‍सान के बराबर होने की बातों को युगों से मान्‍यता देता आ रहा है।इन तमाम अच्‍छाईयों के बावजूद आदिवासी समाज आज टूट रहा है। टूटन की गति समय बीतने साथ तीब्रतर होते जा रही है। हम दूसरे समाज की अच्‍छाईयों को तो नहीं अपना रहे हैं, लेकिन बुराईयों को जरूर अपना रहे हैं। आदिवासी समाज की सामाजिक मूल्‍यों पर हम कोई बहस नहीं करते हैं। हमारी सामाजिक धरोहर, मूल्‍यों, विचारधारा, अच्‍छी सामाजिक परंपराओं, स्‍वतांत्रिक विचारों, समता के मूल्‍यों, भाईचारा, सामाजिक और धार्मिक खुलेपन को बचाए रखने के कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं।

​           हम दूसरे समाज की घार्मिक और साम्‍प्रादयिक भावनों को अपना कर अपने ही समाज में विभेद पैदा कर रहे हैं। य‍द्यपि इस तरह की बुराईयॉ अभी गहरी रूप में अपनी पैठ नहीं बना पाई है। लेकिन यदि हम सजग नहीं हुए तो दूसरे समाज में फैली व्‍यक्तिवादी परंपरा और विचारधारा आदिवासी समाज को खत्‍म कर देगी। समाज में दुख झेल रहे चमरा उरॉंवों ने हमें सोचने, विचार करने का एक मौका दिया है। यदि हम सामाजिक चेतना जगा कर विचार करेंगे तो हम अपने समाज को बचा सकते हैं। अपनी मूल्‍यों को बचा कर समाज में एकता और एक्‍य की भावना को बचा कर रख सकते हैं।​ This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 18, 2016. All rights reserved.

आदिवासी विकास पॉंचवी अनुसूची के रास्ते

नेह अर्जुन इंदवार

आदिवासी समाज युगों से ही एक आजादी पसंद समाज रहा है। वह न तो किसी राज्‍य शक्ति के अधीन कभी रहा था, न ही कोई राज्‍य शक्ति उसके सामाजिक, आर्थिक और सांस्‍कृतिक मूल्‍यों का नियंत्रक था। उस पर वह प्राकृतिक पूजक ही नहीं बल्कि स्‍वाभाव से भी प्राकृतिक जीवन जीने की कला का हमेशा कायल रहा है। वह कभी भी किसी आप्रकृतिक विचारधारा, सांस्‍कृतिक मूल्‍य और सिद्धांत के साथ जीवन जीना नहीं सीखा।

हर मानव स्‍वतंत्र पैदा होता है, लेकिन सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्‍कृतिक और धार्मिक समूह उस पर अपना नियंत्रण स्‍थापित करने का प्रयास जारी रखता हैं, क्‍योंकि बहुसंख्‍यक मानव ही उनकी सत्‍ता और शक्ति का स्रोत होता है। उत्‍पादन, वितरण और खपत पर मानव समूह का ही नियंत्रण होता है। इसीलिए मानवीय समूहों पर प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष नियंत्रण करके ही सभी शक्तियॉं अपनी सत्‍ता को बनाए रखती है।

युगों से आदिवासी समाज को किसी पराए सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक नियमों के तहत बंधने का कोई भी प्रयास पसंद नहीं था। आम आदिवासी दर्शन में समाज को जो कुछ भी प्राप्‍त था, वह सब कुछ प्राकृतिक का दिया हुआ, नैसर्गिक देन था। इसी प्राकृतिक विचारधारा से ओतप्रोत वह न तो जमींदारी प्रथा और न ही अंग्रेजो के द्वारा लादी गई मालगुजारी प्रथा को स्‍वभाविक ढंग से स्‍वीकार किया। भूमि, खेत खलिहान, जंगल, जल, नदी, पहाड, जीवन जीने की मर्जी आदि को प्राकृतिक (ईश्‍वर) का दिया हुआ मानता रहा है और कोई राजा, साम्राज्‍य अथवा किसी शासकीय सत्‍ता को कभी भी इसका मालिक नहीं माना। इन्‍हीं विशेषताओं के कारण आदिवासी समाज को एक स्‍वच्‍छंद, स्‍वतंत्रता पसंद जीवन का स्‍वामी माना गया है। गैर आदिवासी या बाहरी सामाजिक शक्तियॉं चाह कर भी प्रत्‍यक्ष रूप से अपने जीवन दर्शन को उन पर उनकी मर्जी के बगैर थोपने में नाकामयाब रहीं हैं।

सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में भारत के सभी आदिवासी क्षेत्रों में अंग्रेजों की राजसत्‍ता को आदिवासियों ने हथियारबंद चुनौती दिया था। जमींदारों और अन्‍य एजेंटों के माध्‍यम से अंग्रेज अपने शोषण-आधारित राज्‍य व्‍यवस्‍था, जीवन-दर्शन को उन पर लाद रहे थे। आदिवासी समाज से इन सभी का तीब्र विरोध किया गया।

1772-80 का पहाडिया विद्रोह, 1780-85 का तिलका माझी के नेतृत्‍व में संताल विद्रोह, 1795-1800 का तमाड और मुण्‍डा विद्रोह, 1798 का वीरभूम, बांकुडा का चौर विद्रोह, 1798-99 का मानभूम में भुमिज विद्रोह, 1800-02 में तमाड के दुखन मानकी के नेतृत्‍व में मुण्‍डा विद्रोह, 1819-20 में भुखन सिंह मुण्‍डा के नेतृत्‍व में हुए मुण्‍डा विद्रोह, 1832-33 में भागीरथी, दबाई गोसाईं और पटेल सिंह के नेतृत्‍व में हुए खेरवार विद्रोह, 1833-34 में वीरभूम के गंगा नारायण के नेतृत्‍व में भुमिज विद्रोह, 1855-60 के संथाल विद्रोह इसके उदाहरण हैं। उन्‍नीसवीं सदी के दौरान एक पैसे का मोल बहुत था और आदिवासी विद्रोह से अंग्रेज कितने हैरान परेशान या डरे हुए थे कि संथाल विद्रोह के नायक सिद्धू और उसके भाई कान्‍हू को पकडने के लिए उन्‍होंने दस हजार रूपया इनाम घोषित किया था। 1856-57 में बुधुबीर उरॉंव विद्रोह, 1870-80 में तेलंगा खडिया के नेतृत्‍व में हुए विद्रोह, 1874-99 को भगवान बिरसा मुण्‍डा के नेतृत्‍व में उठे उलगुलान आंदोलन, 1914 में गुमला के जतरा उरॉंव (भगत) के नेतृत्‍व में हुए टाना भगत आंदोलन, 1919 में डुवार्स के तेभागा-टाना भगत आंदोलन आदि में लाखों आदिवासियों ने अपने स्‍वतंत्रता और स्‍वराज को बचाए रखने के लिए बलिदान दिया।

उन्‍होंने अंग्रेज और उनके एजेंटों के वजूद को मिटाने के लिए अपना सर्वस्‍व न्‍यौछावर कर दिया था।
जमींदारी प्रथा और प्रशासन के माध्‍यम से आदिवासी अंचलों और समुदायों को नियंत्रित करने का प्रयास आदिवासी समाज की सार्वभौमिकता के लिए एक गहरा धक्‍का था। वे हैरान थे कि ये कैसे लोग और सिस्‍टम हैं जो हम आदिवासियों, हमारी अस्मिता और समाज को अपने नियं‍त्रणाधीन रखने का सजो सामान समझते हैं। ये लोग किस तरह और कैसे प्राकृतिक या ईश्‍वर का स्‍थान लेने का प्रयास कर रहे हैं। आदिवासी समाज में युगों से समता और समानता की भावना और मूल्‍य गहरे मन:स्थिति में पैठ चुकी थी। वे अपने को न तो किसी से ऊँच या श्रेष्‍ठ समझते थे न ही किसी को अपने से कमतर। दो मानव के बीच असमानता की भावना समाज में दूर-दूर तक नहीं थी। समाज में धर्म, संस्‍कृति, भाषा, खेती-पद्धति, शादी-विवाह, पर्व-त्‍यौहार, नृत्‍य-गीत, हॅसी-मजाक या शिकार जैसे सामूहिक कार्यो में कभी ऊँच-नीच, भेदभाव की परंपरा का विकास नहीं हो पाया। लेकिन पक्षपातीय भावनाओं और कमजोरों के शोषण पर आधारित सिद्धांत के द्वारा समाज को नियंत्रित करने की बाहरी दुर्गुणों को समाज हमेशा अस्‍वीकार किया और गैर-आदिवासी मूल्‍यों को थोपने की कोशिश करने वालों के प्रति समाज प्रतिहिंसक हो उठने तक अपनी भावना को प्रकट किया।

अपने जीवन पद्धति, स्‍वशासन और स्‍वतंत्रता के प्रति अत्‍यंत संवेदनशील आदिवासियों के हिंसक प्रतिरोधी आंदोलनों को ध्‍यान में रखते हुए अंग्रेजों ने आदिवासी क्षेत्रों के लिए शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक (The Scheduled District Act of 1874 (Act XIV of 1874) बनाया। शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक के लिए ब्रिटिश शासन व्‍यवस्‍था के तहत सेंट्रल और प्रोविंसियल लेजिस्‍लेटिव को कानून बनाने का हक नहीं था। लेकिन गवर्नर-इन-कौंसिल को हक था कि वह सेंट्रल और प्रोविंसियल कौसिलों के द्वारा पारित किसी भी कानून को शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक में लागू करने का आदेश दे सकता था, किन्‍तु गवर्नर जनरल के द्वारा उक्‍त कानून के किसी भाग के अपवाद और संशोधन (subject to such exceptions or modifications as the Governor thinks fit) की अनुमति होने के बाद। Montague-Chelmsford Reforms treated में इन्‍हीं क्षेत्रों को Backward Tracts कहा गया और भारत सरकार अधिनियम 1919 को इन क्षेत्रों में लागू करने से रोका गया ।

भारत में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ बढ रहे असंतोष को कुंद करने के लिए बनाए गए सुधारवादी कानूनों को आदिवासी क्षेत्रों में लागू नहीं किया। अंग्रेजों का मत था कि अगडी भारतीय समुदाय सुधारवादी कानूनों की आड में पिछडे आदिवासी क्षेत्रों में शोषण करेंगे और उससे उपजे असंतोष की भावना से ब्रिटिश शासन को नुकसान पहॅुंचेगा। लेकिन कुछ समय उपरांत इन क्षेत्रों (शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिकों) को दो भागों में बॉट कर कुछ भागों में आंशिक रूप से सुधारवादी कानूनों को लागू किया गया। इन्‍हीं दो भागों को भारत सरकार अधिनियम 1935 के तहत साइमन कमिशन के सुझाव के अनुसार Excluded Areas and Partially Excluded Areas कहा गया और प्रस्‍ताव दिया गया कि इन क्षेत्रों का प्रशासन प्रांतीय सरकार से लेकर भारत सरकार के हाथों में दिया जाए। इन क्षेत्रों में गवर्नर जनरल की विशेष अनुमति के सिवा कोई भी साधारण कानून, अपवादों और संशोघन के शर्तो के सिवाय, लागू नहीं होता था। इन क्षेत्रों में किसी भी कानून को तब तक लागू नहीं किया जा सकता था, जब तक कि स्‍वयं गवर्नर जनरल अपने विवेकाधीन शर्तो के सहित अनुमति न दें। इन्‍हीं क्षेत्रों में ही देश की आजादी के बाद पॉचवी अनुसूची के प्रावधानों को लागू किया गया । उत्‍तरपूर्वी राज्‍यों को छोडकर देश के अन्‍य हिस्‍सों में बसने वाले अनुसूचित जनजाति के सांस्‍कृतिक, सामाजिक, प्राकृतिक, राजनैतिक, आर्थिक अधिकारों की रक्षा करने के लिए संविधान की धारा 244 (1) के उपबंध बनाए गए।

शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक बना कर आदिवासियों को साधारण कानून से मुक्‍त रखने का प्रमुख कारण था कि प्रगतिशील समाजों पर शासन करने के लिए बनाए गए कानून और उसके नियम काफी दुरूह, जटिल और विभिन्‍न प्रकार से व्‍याख्‍या पर आधारित होते हैं। उन कानूनों और नियमों के सहारे कानून की बारीक जानकारी रखने वाले समाज या समूह उन्‍हें अपने शोषण का माध्‍यम बना सकते हैं। शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक बना कर एक ओर उन्‍हें कानूनी दॉव पेंच और मुकादमेबाजी के वातावरण से बचाया गया, दूसरी ओर उन्‍हें इसके माध्‍यम से स्‍थानीय शासन स्‍वयं चलाने के लिए ऑटोनोमस दिया गया।
Gazette of India, 1881,Pt.I p.74 के अनुसार The Scheduled Districts Act, 1874 (14 of 1874), के द्वारा जलपाईगुडी जिला के पश्चिम जलपाईगुडी और पश्चिमी डुवार्स को शिड्यूल्‍ड डिस्ट्रिक के रूप में घोषित किया गया था। उल्‍लेखनीय है कि रंगपुर जिला के उत्‍तरी भाग और पश्चिम डुवार्स (वर्तमान डुवार्स अंचल) (असम के ग्‍वालपाडा आदि कुछ जिले कभी पूर्वी डुवार्स के रूप में जाने जाते था) को मिला कर 1869 में जलपाईगुडी जिले का गठन किया गया था। तब तक डुवार्स तराई में अनेक चाय बगान बन चुके थे और यहॉं छोटानागपुर, संथाल परगाना के मजदूर स्‍थायी रूप से बस गए थे। उल्‍लेखनीय है कि शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक एक्‍ट 1874 के द्वारा ही छोटानागपुर डिविजन के हजारीबाग, रॉंची, पलामू, मानभूम, परगना ढालभूम और सिंहभूम के कोल्‍हन क्षेत्र को भी शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक के रूप में घोषित किया गया था। तब बिहार और उडिसा राज्‍य ब्रिटिश बंगाल का ही हिस्‍सा था और छोटानागपुर के जिले और जलपाईगुडी जिला आदि ब्रिटिश बंगाल प्रांत का ही भाग था। उन्‍नीसवीं सदी में छोटानागपुर (रॉंची, हजारीबाग) संथाल परगाना के आदिवासी काम की खोज में किसी अन्‍य प्रांत में नहीं गए थे, बल्कि अपने ही प्रांत अर्थात तत्‍कालीन बंगाल के अन्‍य जिले अर्थात् जलपाईगुडी और दार्जिलिंग में काम करने आए थे। दूसरे शब्‍दों में बंगाल के आदिवासी मूल रूप में बंगाल के ही वासिंदे हैं और आदिवासी धर्म, भाषा, संस्‍कृति आदि बंगाल की मिट्टी की पैदाइश है।
भारतीय शासन व्‍यवस्‍था के विकेन्‍द्रीकरण, आदिवासी समाजों की विशिष्‍ट पहचान और सांस्‍कृतिक सम्‍पदा को बचाए रखने, उनके सामाजिक, आर्थिक तथा राजनैतिक हितों की रक्षा करने के लिए संविधान निर्माताओं ने देश के आदिवासी क्षेत्रों को दो हिस्‍सों में बॉंटा। Excluded and Partially Excluded Areas को अनुच्‍छेद 244 (1) (पॉंचवी अनुसू‍ची) तथा अनुच्‍छेद 244 (2) छटवीं अनुसू‍ची) (ट्रायबल क्षेत्र) के प्रावधानों के अन्‍तर्गत उन्‍हें स्‍वायतता प्रदान किया गया।

डुवार्स और तराई के आदिवासी चाय अंचलों में बसे हैं। उनकी बदहाली और विपन्‍नता किसी से छिपी नहीं हैं। वे दिहाडी आय पर सम्‍पूर्ण रूप से निर्भर हैं और इन्‍हीं रोजगार के साधनों पर प्रत्‍यक्ष अथवा अप्रत्‍यक्ष रूप से अंकुश रखकर आज आदिवासी समाज पर नियंत्रण रखा जा रहा है। उन्‍हें सीमित आय पर रहने के लिए मजबूर करके उनकी शिक्षा, संस्‍कृति, सामाजिक और अन्‍य आर्थिक कार्यकलापों पर सीधा नियंत्रण रखा जा रहा है। एक आजाद देश में गुलाम जनता कैसी होती है, उसका यह एक जीता जागता उदाहरण है। चाय अंचल के कल्‍याण के लिए टी प्‍लांटेशन एक्‍ट लागू किया गया है। लेकिन वह कागजों में सीमित है। डुवार्स तराई के 300 चाय बागानों में शायद ही कोई एक ऐसा बागान होगा, जिसमें टी प्‍लांटेशन एक्‍ट का उल्‍लंघन न किया गया हो। लेकिन आज तक किसी बागान या प्रबंधन के विरूद्ध कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं की गई। Employees provident Fund के अरबों रूपये के गबन में दिखावे के लिए भी कार्रवाई नहीं की गई। चाय बागानों में शिक्षा और स्‍वास्‍थ्‍य का कोई पुख्‍ता प्रबंध नहीं, लेकिन लेबर कमिशन और प्रशासन ऑखें बंद किए बैठा है। ऐसा लगता है, राज्‍य सरकार के इन कल्‍याणकारी विभागों का विवेक भी चाय बागानों की तरह ही बदहाल है। मजदूरों को नेतृत्‍व प्रदान करने का दावा करने वाले श्रमिक संघ हर बार न्‍यूनतम वेतन से कम में वेतन समझौता करके अपनी काबलियत का प्रदर्शन करते रहे हैं। आदिवासी कल्‍याण के नाम पर करोडों रूपये बहा कर भी राज्‍य सरकार के दूरदर्शी विवेकवान प्रशासकगण आदिवासी क्षेत्रों में विकास की नदियाँ बहाने में नकाम रहे हैं।

पश्चिम बंगाल में आदिवासी जनता आजादी के बाद ही दोयम दर्जे का व्‍यवहार पाती रही है। संविधान की पॉचवीं अनुसूची के अन्‍तर्गत 25 अगस्‍त 1953 को Tribal Advisory Council का गठन किया गया था। लेकिन Tribal Advisory Council ने आदिवासी हित में क्‍या-क्‍या निर्णय लिया या पश्चिम बंगाल के राज्‍यपाल को क्‍या-क्‍या परामर्श दिया, यह आज तक आदिवासी जनता जान नहीं पाई है। पश्चिम बंगाल में Tribal Advisory Council तो बना दिया गया, लेकिन आदिवासी क्षेत्रों को स्‍वशासन देने के लिए कोई कदम नहीं बढाया गया और किसी भी आदिवासी क्षेत्र को शिड्युल्‍ड एरिया घोषित नहीं किया। इसका मतलब यही हुआ कि आदिवासी संस्‍कृति, भूमि, भाषा, समाज को शोषण से बचाने का कोई प्रयास नहीं किया गया। जबकि राज्‍य के प्रशासन को संविधान द्वारा यह निर्देशन स्‍पष्‍ट रूप से दिया गया था। यदि आदिवासी क्षेत्रों को श्डियुल्‍ड एरिया घोषित किया जाता तो उनका हाल आज इतना खराब नहीं होता। संविधान में विशेष उपबंध रहते हुए भी आदिवासी समाज को सामान्‍य कानूनों के हवाले कर दिया गया। इसका प्रतिफल यह हुआ कि आदिवासी समाज शोषण के एक अंतहीन चक्र में फंस कर अपना सर्वस्‍व खोता रहा। ममता मुखर्जी की नई सरकार के द्वारा 14 मार्च 2012 को Tribal Advisory Council के नियम में संशोघन जारी किया गया, लेकिन अभी तक इसके गठन की घोषणा नहीं हुई है। आदिवासी समाज के हित में काम करने वाले करीबन सभी संगठनों को इस बात का पता है, लेकिन किसी भी संगठन ने अब तक इस बात को पुख्‍ता अंदाज में नहीं उठाया है। आदिवासी समाज को नेतृत्‍व प्रदान करने वाले पॉचवी अनुसूची के बदले वर्षो तक छटवीं अनुसूची की मांग करते रहे हैं। संविधान में उपयुक्‍त संशोधन के बिना कोई भी सरकार चाह कर भी छटवीं अनुसूची के उपबंधों को पश्चिम बंगाल के आदिवासी अंचलों में लागू नहीं कर सकती है। पता नहीं किसने छटवीं अनुसूची का राग छेड कर इतना समय और उर्जा का अपव्‍यय करवाया और भोलेभाले आदिवासी जनता को गलत ख्‍वाब दिखलाया।

एक समय था जब आदिवासी समाज किसी का गुलाम नहीं था। लेकिन आज तो सभी लोग आदिवासी समाज को अपना गुलाम बनाना चाहते हैं। गैर आदिवासी तथा अपने स्‍वार्थ में लिप्‍त ताकतें तो आदिवासियों को सामाजिक, सांस्‍कृतिक, भाषाई, आर्थिक और सामाजिक रूप से गुलाम बनाना ही चाहती हैं और बहुत हद तक वे कामयाब भी रहे हैं। लेकिन विडंबना की बात तो यह है कि अनेक आदिवासी भी अपने व्‍यक्तिगत लाभ के लिए उन्‍हें गुलाम बनाए रखना चाहते हैं। आज आदिवासियों के वोट, उनकी ताकत और एकता को अपने व्‍यक्तिगत व्‍यावसायों को सपोट करने, अपनी ठेकेदारी को मजबूती देने के लिए ही कई लोग आदिवासी समाज का नेता बनना चाहते हैं और वे इसमें कामयाब भी रहे हैं। ऐसे लोगों की दिली ख्‍वाहिश है कि आदिवासी जनता उनके कदमों के नीचे ही रहे।

भारत के अनेक राज्‍यों में पॉंचवी अनुसूची के प्रावधानों को लागू करके आदिवासी समाज को शोषण से बचाने के लिए संवैधानिक संरक्षा दी गई है। पश्चिम बंगाल में आदिवासियों की दशा और दिशा अत्‍यंत शोचनीय है इसमें दो राय नहीं है। पश्चिम बंगाल के आदिवासियों के कल्‍याणार्थ पॉंचवी अनुसूची के प्रावधानों के अन्‍तर्गत ट्राइबल एडवाजरी कौंसिल का गठन भी किया जाता है। संविधान में राज्‍यपाल को आदिवासियों का संरक्षक कहा गया है। आदिवासी समाज में निरंतर बढ रहे शोषण और उससे उपजे असंतोष को दूर करने के लिए आदिवासी अंचलों को शिड्युल्‍ड एरिया बनाना आज समय की मांग है। जो आदिवासियों का सच्‍चा हितैषी होगा वह इस मांग से असहमत नहीं होगा। 1874 में आदिवासी जनता को शोषण और अन्‍याय से बचाने के लिए शिड्युल्‍ड डिस्ट्रिक बनाया गया था। लेकिन आज तो आदिवासियों की हालत सर्वाधिक शोषित और वंचित है ऐसे में संविधान में उनके उपचार के लिए बनाए गए प्रावधान ही सच्‍चे रूप से आदिवासी जनता का उद्धार कर सकता है और यह उद्धार सिर्फ पॉंचवी अनुसूची को लागू करके ही हो सकता है।♠ This work is copyright © Neh Arjun Indwar Dec. 2016. All rights reserved